Monday, 19 September 2011

अरमान



ये भी क्या तहजीब है, आग बस करीब है,
जल गए तो कोई भी पहचान नहीं दे सका,
पेट तो सब भर लिए , ख्वाहिशें सब जज्ब हैं,
शिकन कितनी बढ़ गयी, अरमान वो न कह सका,

...
... प्यार के दो बोल बस आवाज सुनकर जान लो,
हंसी की तहरीर पर तक़रीर लिख कर मान लो,
शकल क्या बस चाँद है या निशा की है चांदनी,
सांस कब ली पल वो कब अहसान वो ना कर सका

भीगती,सूखी लकडियाँ जलती हैं आखीर में,
देह की आभा सुखाई, है बंधी जंजीर में,
कंपकपाती ठण्ड या गर्मी में जलता जिस्म ये,
बस शुरू हो या ख़तम , दिल-जान वो न दे सका.

Thursday, 15 September 2011

श्री रविन्द्र जी द्वारा प्रेषित विषय - "गद्दार" (२)



पंचतंत्र पढ़ा ,कुछ वेद पढे ,कुछ किस्से सब षड्यंत्रों के,
चाणक्य पढ़ा, और रामायण सब मन की दिशा लिए चलते,
सब पात्र समाहित कर्म से थे, कुछ गोपनीय पर मित्र बने,
अंतिम परिणित जब रूप खुला, गद्दारों की श्रेणी से लगे.

अब आज का ये परिवेश जहां संज्ञा देते हैं साँपों की,
हैं कुटिल बहुत कुछ पछी भी, कुछ जंतु इन्हीं के जमातों की,
ये प्रकृति मगर कुछ ऐसी है ,हम इंसानों ने नाम दिया,
गद्दार कहा, बेईमान कहा, पर भूख का क्या तब भान रहा ?

सब अर्थ अलग, सब कर्म अलग, सब रूप बदल कर फबते हैं,
गद्दारों की भाषा मैं कहे, ये हर एक रूप मैं मिलते हैं,
उज्जवल हैं वस्त्र पर मन काला , कैसे ये मन को धुलते हैं,
कालिख की परत चढे दिन दिन, ये जीव नहीं जिन्न दीखते हैं.

कब होगा कहाँ इनको है पता, जीवन की मर्यादा या पल,
कोई रिश्ता ना अपनापन, बस चंद सिक्कों मैं बिकते हैं,
विश्वास ही इनका अमोघ अस्त्र, विश्वास को ही ये छलते हैं,
छल बल से जीवन छीन रहे, ये देश की कीमत रखते हैं.
(ऐसा गद्दारों का मानना है)


श्री रविन्द्र जी द्वारा प्रेषित विषय - "गद्दार" (१)



 
गद्दार की परिभाषा ? या छुपी हुयी सी शंका ?
जाहिर किया तो गलती,, सच माना तो ठगे से,
क्या सब्ज बाग़ देखूं, क्या सच मैं सच का होना,
वो शक्श था जो अपना, क्या सच है या वो सपना,

कुछ झूठ का पैमाना , कुछ वफ़ा की कमी थी,
हमने तो अपना समझा, पर वो ही बेगाना था.
ये चंद लब्ज मेरे , अब दर्द से भरे हैं ,
अब गलत हूँ जहा मैं, गद्दार खुद को कहना.

हमराज हमसफ़र सा, वो साथ साथ चलना,
हर कदम पे नवाजिश वो झुक के उसका करना,
ये समर्पण था उसका, और राज हमारे थे,
पर वफ़ा की हदें थी, गद्दार उसका बनना.

ये जिन्दगी नहीं अब सब मायने हैं बदले,
कल जहां ये अलग था, अब नाम कुछ भी कहले,
हर कदम पे हैं जुम्बिश ,हर कदम लडखडाये,
बस दोस्त नहीं मिलते, गद्दार आगे आये.

चलो आँखों के पनघट पर , तुम्हें कुछ ताजगी दे दूं,
बड़ी ठंडी सी पैमाइश, जरा कुछ मुख़्तसर कर दूं,
बहुत दिन से नजर भर देखने की तुमको चाहत है,
ज़रा तुम आँख बंद कर लो, मैं अब दीदार तो कर लूं,

ये जंजीरें जखम करती, येही देहलीज सीमा है,
मैं इस पार पलकों पे तुम्हें उस पार तक देखूं,
नहीं रुकते हो तुम जब सोचकर ये मेरी दुनिया मैं,
आँख के कोर हैं छलके, हूँ वापस अपनी दुनिया मैं.

विरह के द्वार पर बैठी, निहारूं विरहिणी सी मैं,
वो रुक कर पलटना थोड़ा, नहीं कमजोर हूँ अब मैं,
बंधी है डोर जब तुमसे, निभाऊंगी अंत साँसों तक,
नहीं हूँ विरह की मारी, सजन तुम मेरी आशा हो.


Monday, 12 September 2011

मर्म



 ,
कहीं छलक जाते हैं आहत हो,
कहीं पर पी के हंसते हैं,
मर्म आंसू की कुछ बूँदें,
समाये शब्द हैं इनमें,

... नहीं कहती मैं सागर हूँ,
ना ही नदिया की ये धारा,
मगर एक बूँद बारिश की ,
भुला देती है गम सारा,

ये भी क्या बात है उसने
ज़रा मिन्नत से पुछा था,
उडेला सारा मर्म-ओ-गम,
मगर शब्दों का खेला था,





श्याम बांसुरी


श्याम बांसुरी छुवत ही लागे , मन तन से मैं श्याम होवे गयी,
धरनी धरन के पगन की धुन मन ही मन अभिराम होवे गयी,
रंग रूप सब बदल गयो है, श्याम श्याम अब सबही पुकारे,,
नाचत छम छम कदम के नीचे, श्याम आज अब नाहीं म्हारो

ई जो बांसुरी तन से लागी, मन वैराग मैं बदलन लाग्यो ,
मन भंवरा अब उड़त गिरत है, तन सरोज कुम्भ्लात हमारो,
रीति प्रीती सब भूल गयी है, कोऊ ना मोको राधे पुकारेयो,
श्याम ,कन्हैया मन विलखत है, तोरी बांसुरी तुम्ही सम्भारेयो

मन है विहग तन भयो सांवरो, अब ई पर ना वश है हमारो,
सुध बुध खोय सब हार गयो मन, सब कुछ प्रियतम भयो तिहारो,
स्वर लहरी सब नाद निनादित, सब मैं ब्यापित नाद विचारो,
अब न कहैगो राधे मोको, श्याम कहो अब लागत प्यारो,


Saturday, 3 September 2011

ईश्वर के दर्शन भी दुर्लभ-मन से देखो अच्छा है

 ईश्वर के दर्शन अब दुर्लभ है, सोने के भाव जैसे चढे आसमान पर,
     फूल पत्र जल तो पुजारी चढ़ाते हैं, इंसानों की तो मर्यादा आसमान पर,
     हम तो पुजारी हैं घर मैं ही श्रध्हा है, दर इनका महंगा है रत्नों की खान पर,
     मिलना है इनसे गर,परिचय देना होगा, नहीं है भरोसा इंसान का इंसान पर,

     इश्वर भी मिलने से कतराते लगते हैं,खाली हाथ जाना अब येही प्रमाण है,
     कितना बड़ा आदमी है, कितना रसूख उसका, बात नहीं बची अब कैसा स्वाभिमान है,
     मन मैं तलाशा बहुत प्रभू नहीं मिलते हैं, द्वार पे जो दरस करें खडा दरबान है,
     मेहनत हलकान करे ,लोग थके हारे मिले, उसका  भी दर बड़ा उसका एहसान है

     अब तो ये गीता के वचन याद आते हैं ,कृष्ण रूप विष्णु का सब ही पुराण है,
     कर्म करो, तप जैसा  ,येही तप इश्वर है, दर्शन तो दूर बस कर्म ही प्रधान है,
     पेट भरा अगर तेरा, प्रभू की तब चाह करो, फलित होगा उसी समय ये ही गुणगान है,     
     ऊपर से नीचे तक रत्नों से लसे बसे, ह्रदय मेरे आकर बसों येही अरमान है
...