विषय मिला है लिखने को खुद के जीवन पर या किसी नारी पर लिखूं ?
रूप कितने, भाव कितने, ये कदम और वो तरीका,
भीगी सी वो हंसी लिखूं, माँ के माथे का वो टीका,
रिश्तों के कुछ नाम लिख दूं, या लिखूं दर्पण सलीका,
मन से मन की डोर बांधू ,या कहूं कोई कहानी,
बचपने का सुख मैं बांटूं, या ब्यथा की वो रवानी,
सारे भावों को जो सोचू, सारी उपमा याद कर लूं,
वर्ण रख दूं मैं छुपाकर, बस कहूं मैं कथा "नारी "
नारी और लड़की
ओह ! लड़की जनी तुने, बंश कैसे अब चलेगा,
ये तो होती धन पराया, और सब कैसे पलेगा,
माँ की छाती, धन पराया, ह्रदय कोमल सारा जीवन,
उसके तन का एक टुकडा, येही से प्रारम्भ "नारी"
स्वप्न के पंखों पर "नारी"
स्वप्नों की सौगात मिली है हर नारी को बचपन से,
आँख खुली और खुद से देखा,रूप एक अपने मन से,
ये उसके अस्तित्व का पहलू, नहीं जान पाया कोई,
पंख लगे जब स्वप्नों के तब उडी धरातल खुद लेकर.
और पराई हुयी नारी
छनक छनक वो नूपुर की धुन , स्वप्नों की सौगात लिए,
छोड़ दिया वो आँगन माँ का, लांघी देहरी अपने घर की,
अब ये परिणित होंगे सपने, जो सोचा वो होगा क्या,
प्रश्नों के दामन का आँचल, ओढ़ा है जो उसका क्या ?
अभी तो जीवन शुरू हुआ है, जीवन की संतति भी यही,
सुख दुःख येही धरातल अपना, क्या खोया क्या भोगा क्या,
नारी शब्द एक जीवन है,जीवन का मतलब या वस्तु,
हाथ खिलौना बन जाती है, खेल किसीने देखा क्या,
चूल्हा चौका और मात्री रूप का जगत नमूना बस नारी
फिर भी लोग विषय देते हैं एक निबंध लिखो नारी ,
क्यों ये प्रश्न मुझे चुभता है, क्यों नारी है विषय बनी,
जितना सोचूँ उतना उलझूं, मन को ब्यथित करे जननी
सारे रीति रिवाजों मैं नारी को आगे रहना है,
भाग्य विधाता दुःख दे जब तो बस नारी को सहना है,
सब कुछ ओढ़ लिया है इसने, अब भी विधि कुछ लिख है रहा,
अगर येही सब सहना था तो नारी का क्यों जनम दिया ?
अग्नि समर्पित सीता और राधा है समाई कृष्ण कहीं,
मीरा ने जब सब कुछ त्यागा, छोड़ सभी साध्वी बनी,
लक्ष्मी बाई ने खुद जौहर से सबको ललकारा था ,
माँ दुर्गा जो जग की जननी , सब असुरों को संहारा था,
हम सब काव्य पुराण पढ़ें पर महा काव्य बस नारी है,
जीवन का सुख दुःख इससे ही, दुःख से कभी ना हारी है,
लो दहेज़ की सौगातें और इसे जलाओ कागज़ सी ,
ओ ! पुरुषों क्या समझा तुमने, नारी विषय और वस्तु बनी ?
जीवन की हर विधा है सहती , हर पल को ये जीती है,
हर वर्गों मैं आगे रहकर , खुद को नारी कहती है
क्या अब तक बस येही है निश्चित, चलो लिखो कुछ नारी पर,
धरती से अब चाँद की दूरी , और नापना बाकी है ?
ये जो रोशनी है उसके लिए आसान होगी,
दिए की लो उसे रास्ता दिखा ही देगी,
सुबह निकला था ज़रा काम की तलाश लिए,
मन के अँधेरे मैं किरण थोड़ी सी बुहार लेगा.
... कैसे कह दें नहीं होती फरियादें पूरी,
वो तो अपना तर्जुमा है उससे मिन्नतों का,
चलता है मुसाफिर मंजिलों की तलाश लिए,
हम तो बस राहों को पलकों से नाप लेते हैं.
एक रास्ता जाने कितने कदम उसके साथ चले,
दिशाएँ "चार" जाने कितने लोग हर तरफ बिखरे हुए,
कितने खो जाते हैं इन रास्तों पर भटकते हुए,
तुम इस दिए की रोशनी को नजरअंदाज मत करना,
क्यों कहते हैं ये लड़की है, जाने दो औरत जात है ये,
अब क्या बोलूँ ये रक्त उबलता पल पल ये सब सुन सुन कर,
हो गया जनम , कुछ आहों से , ओह क्या जन्मी -ओह ! लड़की है,
बचपन प्रतिबंधों से बंधित क्यों मन है ब्यथित "वो लड़की है.
हे! बिटिया बाहर मत जाना थोडा समझो तुम लड़की हो,
ये जनम लिया लड़की बन कर, बाहर देहलीज पे रुके कदम,
कहते हैं सब रस्मी बातें, हो गया जमाना बदतर ये,
उन्नति अवनति के माने क्या, सब तौल रहे "वो लड़की है".
जीवन के जितने भाव यहाँ, बस विरह प्रेम से नाता है,
संरछक ना हो जीवन मैं, फिर लड़की से क्या हो पाता ,
ये तो है पराया धन तबसे ,जब जनम लिया इस धरती पर,
जो भी कर्तव्य निभाया वो सब मिथ्या है "वो लड़की है"
बस शांति दया की मूर्ती रहे ,स्वागत सत्कार मैं हो आगे,
मीठी वाणी और सृजन ही बस, नम आँखें जलपूरित जागे,
कितने भी सुंदर स्वप्न दिखे, बस नेत्र सजल और पूर्ण हुआ,
अब किन शब्दों मैं बया करू ,क्योंकि "वो तो लड़की है"
माँ की ममता से ओत प्रोत, निर्झर वात्सल्य है उसके मन,
सारी पीड़ा को जज्ब किये, बस निकली घर से खुशी लिए,
अब प्रेम दिखाओ इससे तुम, या करो समर्पित अग्नि इसे,
ये अब वापस ना जाएगी , है लाज बंधी आँचल इसके
सारी बंदिश को तोड़ ताड़ जब नारी आगे आएगी,
ये प्रकृति जन्य विविधा लड़की अपनी शक्ति दिखलाएगी,
क्या दंभ तुम्हें इस शक्ति पर, क्या मर्यादा पुरुषों को ही,
"वो लड़की है" पर विवश नहीं , पूछो गर राह दिखायेगी,,,
"क्योंकि वो लड़की है "

वो मुड़ा तुड़ा सा एक लिफाफा ,जिसमें संचित कुछ यादें हैं
बचपन की चुगली से लेकर, इश्वर तक की फरियादें हैं,
उसे लिखा था एक बार कुछ , दिया नहीं हम हुए किसीके,
नाम नहीं बस शब्द लिखे थे, मेरे थे पैगाम ह्रदय के,
मन विरक्ति की बातें लिख दी, कोरे पन्ने भर डाले थे,
अंतिम अछर लिखते लिखते आंसू ने सब धो डाले थे
गर्म थी बूँदें ,मन था शीतल, नहीं बचा कुछ लिखते लिखते,
एक दास्ताँ अधूरी सी है, पढ़ा ना मैने लिख कर के फिर,
अब जैसे ही धड़कन बोले, चलो ज़रा खोले ये परते,
फटा लिफाफा तार तार सब , मन के भाव तिरोहित हो ले,
जीवन मैं जाने कितने छन ऐसे ही बस हो जाते हैं,
बार बार मैं याद करू ये पर ये लिफाफे बंद रहेंगे
वो सपनो की दुनिया से बाहर आकर सोचकर यूँ मुस्कराना,
अभी तो शुरुआत के दिन, दो दिलों का हार जाना,
मुस्कराना किस वजह से, है बड़ी तादाद लम्बी,
... घर का ये छोटा झरोखा, यादों से मुस्कान बिखरी,
वो बडे छोटे से दिन जब गली बचपन और गेंदें ,
एक ही पाले थे खेले, बंदिशों की बात झेलें ,
अब नहीं उठते हैं पग ये, भूलकर ऊंची दीवारें,
बागों मैं वो आम तोडे, भरते भागे सब कुलांचें.
अब ये मन अपना है निष्ठुर, भूलना है उस गली को,
है दीवारें ऊंची ऊंची, खोजती हैं मौसम की बहारें,
इन्हीं हम आइना सा साफ़ कर कुछ देख लेंगे,
जो रिवाजों मैं लिखा है, उन्हीं से सब बूझ लेंगे.
अब तो जीवन अलग सा है, अब नयी पहचान मेरी,
उसकी खुशियाँ हैं बचन सब, जो कहे वो मान लेंगे,
माँ !वही हूँ अब भी मैं बस ,घर है बदला अलग सा ये,
लोरियां सब याद रखना, जब मिलूँ मुझको सुनाना,