Monday, 14 November 2011

कभी कभी बादल कुछ जल्दी ही बरस जाते हैं

कभी कभी बादल कुछ जल्दी ही बरस जाते हैं.

by Suman Mishra on Sunday, 13 November 2011 at 21:14

कभी कभी मन की तल्खियां कुछ शोर सी मचाती हैं,
उसकी नाराजगी मन पे असर सा कर जाती हैं,
जाने कितने वादों की दीवार टूट जाती यहाँ,
आज नहीं कहेंगे कुछ मन को समझाती हैं.

क्यों उसकी याद मैं मन डूब डूब जाता है,
क्यों उससे दूर दूर रहके पास आता है,
क्यों उसका नाम यहाँ मन को भरमाता है,
कहीं रहो, कुछ भी करो, बस उसे ही बुलाता है,

बादलों की परत चढी, आसमान छिपा हुआ,
चाँद और तारों का घर भी गुमनाम हुआ,
कहाँ है वो कैसा है, मिलना एहसान हुआ,
जोर से पुकारूं उसे , दिल का फरमान हुआ,

अब तो इन बादलों से राह बनाना होगा,
इनके ही रास्ते उस देश में जाना होगा,
किसीने कहा था अपनी तल्खियों को ख़तम कर लूं,
कभी कभी बादल कुछ जल्दी ही बरस जाते हैं,,,,

Wednesday, 9 November 2011

ये स्वप्न भी ना ....


ये स्वप्न भी ना ....

 
श्याम और बांसुरी की धुन का क्या ,वो तो बजेगी,
मधु मधुर सी तान सरगम गीत बन छलती रहेगी,
नूपुरों की ध्वनि त्वरित हो, यमुना के संग जा मिलेगी,
पत्र हों कदम्ब पात, लेखनी उस पे लिखेगी,

कल्पना श्रृगार की हो , रूप रस पराग लेकर,
अधर के रंग पंखुरी से, स्वप्न से उधार लेकर,
टूटना ना लिया वादा, स्वप्न मन विहार तो कर,
एक पल जो पारदर्शी , नेत्र खुले निहार पल भर.

कब रुका है स्वप्न का रेला वो तो बस छनिक सा है,
श्याम के रंग रंगी राधा, रंग नीला हरा क्या है,
प्रतिध्वनित ये बिम्ब जल मैं, छू दिया तो मिल सका ना,
येही स्वप्नों की व्यथा है ...उफ़ ये स्वप्न -स्वप्न भी ना

उस पार से इस पार तक तुम ....लौट आओ अब ,,,(पुकार)


उस पार से इस पार तक तुम ....लौट आओ अब ,,,(पुकार)

by Suman Mishra on Wednesday, 09 November 2011 at 00:32

एक नज़र जो मुझपर ठहरी , दिल और वजूद तुम्हारा हो गया,
फूल सूख कर उडे पंख से, मन रंगों के साथ ठहर गया,
गए तो तुम परदेश ही कहकर , इंतजार जन्मों में बदल गया,
हम हैं तुम्हारे कहा था  तुमने, अब परदेशी बात मुकर गया.

बही हवा पुरवैया सी थी, महक गयी चन्दन की डाली,
मन भुजंग सा लिपट रहा है, यादों की बदली मतवाली,
बरस गयी है मेरे आँगन , महक में मिटटी बने सवाली,
क्या परदेस में सब भूले हो, याद नहीं अंखियों की आली ?
पार करो मन के भंवरों को, बीच समंदर घूम रहे हो,
इधर दिया भी नहीं जला है , वहाँ पे सूरज माप रहे हो,
नैनन में जल भरे भरे से, बूँद ठहर कर बाट जोहते,
दिल की बात अब करू में किससे, लहर पे नौका राह रोकते,
बहुत हुआ परदेश तुम्हारा, लौट के आओ पार यहाँ पर,
एक एक पल सब नाम तुम्हारे, मन है बसा उस पार वहाँ पर,
कौन दिलासा ,किसकी आशा , रुकता नहीं अब पंछी है ये,
पर मन का पिंजरा है यहाँ पर, फर्ज की बेडी बंधी पाँव पर.

Monday, 7 November 2011

कृष्ण की बांकी चितवन न्यारी ,राधे हार गयी मन को


कृष्ण की बांकी चितवन न्यारी ,राधे हार गयी मन को

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कृष्ण की बांकी चितवन न्यारी , राधे हार गयी मन को,
स्वर्ण रंग अब श्याम भयो है, राधे भूल गयी तन को ,
नाचत झूमत ,गावत ,निकसत भई बावरी मानत ना,
सबहिन को अब श्याम बतावत, राधे एक  सुहावत ना.

हे कान्हा अब तोरी बांसुरी , जबसे सुनी मन भ्रमित भयो,
तृष्णा भरी है मन में मेरे, एकौ छन मन विछरत ना,
देत दिलासा विहरत इत-उत, नैन थकत अब सोवत ना,
एकै चितवन धन्य भयो मन, मन यो पहेली बूझत ना.

कृपा दृष्टि औ मन है साछी , प्रेम सफल भयो जीवन को,
कृष्ण की बंसी रहेयो पुकारत हरदम नाम यो राधे को,
आवत जात सबैं में बस्यो है श्याम ही श्याम निहारत है,
नाद नाद अब शंख चक्र धरी , राधे कृष्ण विराजत है,,,

प्यार और नफरत दोनों ही जरूरी है.....


 


कोई काँटों से खेला है, कोई फूलों की खुशबू से
मगर ये प्यार का मतलब क्यों नफरत शुरू करता,
ये अंधा प्रेम आँखें बंद, मगर सारा जहां पागल,
जब आँखें बंद हो जिसकी, क्यों देते जान सब इस पर ,

कली बागों मैं खिलती हैं, टंके हैं उसके बालों पर,
कभी पैरों  के नीचे हैं कुचलते दिल बनाकर वो,
यहाँ नुक्सान किसका दिल का दरिया सूखता क्यं है,
येही तो बात नफरत की, मुहब्बत पे ही काबिज है.



बड़ी खामोश नज़रों से , थी देखी राह उसकी जब,
ना आया वो बुलाने पर, लिखी तहरीर उस ख़त में,
कोई शिकवा नहीं करना, मिलन ये हो नहीं सकता,
मोहब्बत ना सही अपनी, मगर तुम दोस्त ना खोना,

येही दफना दो बातों को, शुरू हो नयी तहरीरें,
मगर ये छल कहाँ रखूँ, नफरतों के बगीचे मैं ?
उगेंगे पेड़ अब इनसे , फ़ैल कर बेल लिपटेगी
बड़ी प्यारी सी एक दास्ताँ मोहब्बत की सुनाएगी,


कहीं तो अंत हो इसका, ना नफरत प्यार का हिस्सा,
ये सौदा कर मोहब्बत से , वफ़ा से मिल के कायम कर ,
बड़ी उम्मीद रिश्तों से, नहीं करना मना फिर तुम,
ये जज्बा सांस की थिरकन से जुड़ता जन्मों जन्मों से,

Saturday, 5 November 2011

अभी अभी एक लम्हा गुजरा


अभी अभी एक लम्हा गुजरा

by Suman Mishra on Sunday, 06 November 2011 at 01:08

अभी अभी एक लम्हा गुजरा ,जाने कितने रंग उकेरे,(आरम्भ ..इस भाषा से//बाकी सब श्याम रंग)
एक कहे भई श्याम की राधा, एक रुक्मिणी के पग फेरे,
एक देत मीरा को दुहाई , एक गोपियन के रंग बिखेरे,
कोऊ कहे सब श्यामल श्यामल, जित देखो तित श्याम घनेरे

प्रीत की रीती ना जानत कोऊ, एक रंग आंवत, दूजो छावत,
श्याम की राधा सब जग जानत, काहे प्रीती को झूठ बतावत,
मधुर अधर लय बांसुरी बाजत, स्वर लहरी पै नाच नचावत,
वाकी मर्जी राधा को संग, अगले ही छन कोऊ और रिझावत,

नेह लगाय लियो कान्हा से, मुरली मनोहर नाम  बतावत,
द्वार खडे है सुदामा को गेह भरे भरे अश्रु बहावत,
प्रेम की मदिरा श्याम नैन में, जान सको कछु भेद जनावत,
जगत में रूप को राशी कहो जन, ऐसन रूप तो नाही बनावत

Thursday, 3 November 2011


कभी कभी मन खुद को भी ठुकरा देता है,,,

by Suman Mishra on Tuesday, 01 November 2011 at 12:06

हाँ कुछ ऐसा ही होता है, क्या ये सच है बोलो तो ?
मन ही मन का दुश्मन बनता -क्या ये सच है बोलो तो ?
मन ही  मन से द्वन्द है करता -क्या ये सच है बोलो तो ?
उसके दुःख में  खुद को पाता -क्या ये सच है बोलो तो ?

कभी कभी  मन पत्थर बन खुद को ठुकरा देता है यूँ,
चलो हटो अब परे ही रहना , बात ना करना मुझसे तुम,
मन ही मन को समझाता है , क्या कहते हो सोचो तो,
मन ही मन को डांट लगाता , कहता मन को रोको तो,

कभी कभी मन चलता पीछे उन अतीत के आज को मान
नहीं भूलता बीते पल को ,मन को ठगता सच को जान,
क्या लौटेंगे बीते पल या , चला गया वो आयेगा ?
क्या मन को मन देके दिलासा सच को समझा पायेगा ?


कोई नहीं समझ पाया मन ये तिलस्म में बंटता है

इश्वर को दे धोखा मानव खुद को हरदम छलता है,

मन से प्यार बढ़ा कर फिर वो प्यार अधूरा रखता है,

नहीं पूर्ण वो कर सकता मन ,खुद ही मन से डरता है


 

हमने तो इतना जाना है बस खुद से ही प्यार करो,

स्नेह दुलार के भागी बनकर, मन का खुद सत्कार करो.
जो है दूर उसे तुम खींचो , प्रेम डोर ना छोटी हो,
मन के तारों से झंकृत मन, मन ही मन सरगोशी हो.
ऐसा भी क्या जीवन में हरदम यूँ बंध कर रहना है,
मीत नहीं पर , गीत बहुत हैं सुर लहरी में बहना है,
ये बहाव जो प्रबल मधुर सब इसी मोह में आयेंगे,,,
पर कुछ बाकी खाली पन्ने कभी नहीं भर पायेंगे,,