Wednesday, 8 February 2012

ये आपा धापी जीवन की , थोड़ा विचलित थोड़ा सा बस....

ये आपा धापी जीवन की , थोड़ा विचलित थोड़ा सा बस....

by Suman Mishra on Thursday, 22 December 2011 at 12:24 ·


मन सच्चाई को समझ ज़रा,
क्या लोग वही जो दीखते हैं,
मन मान रहा बस वही देख
ये रस्म रिवाज है दुनिया का.

मन भंवर बहुत ही ब्याकुल है,
ये जीवन उहा-पोह ही बस ,
बस लोग बात के बादशाह ,
ये जुबां और तलवार एक ,


रिश्तों के माने  देख लिए ,
सब सम्मोहन की भाषा है,
मन मौन रहे तो अच्छा है,
मन बोल पडा तो क्या होगा,


बस शांत रहूँ ये सोचा है,
लोगों की मजलिस नहीं जमी,
शब्दों की चाशनी जैसी भी
हर तार -जाल सब उलझे हैं.
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कल हल्की बरसात की खुशबू आज महक इस मिटटी में है

कल हल्की बरसात की खुशबू आज महक इस मिटटी में है

by Suman Mishra on Thursday, 22 December 2011 at 00:35 ·


कल हल्की सी बारिश थी,कुछ बूँदें गिनकर रख ली थीं,
पर जब तक कुछ मुट्ठी में टिकी,जाने कितनी फिर बरस गयी,
सोंधी माटी की खुशबू  से मन जाने कैसे बहक गया,
सारे उपवन की सुरभि येही , इस माटी मन में बिखर गयी

क्या होता है इस माटी में , सूखी पैरों के साथ चले,
अम्बर की बूंदों से भीगी, खुशबू बन कर ये महक बने
कुछ एहसासों के भावों में , कुछ मिलन प्रेम की छावों में
टप-टप बूंदों की ताल से ये सोयी कलियों की भाँती खिले.
 

प्रेमी विह्वल मन भीग भीग सूखा है कितनी बार यहाँ,
इस रूप राशि की मन सुगंध से बहका खर पतवार यहाँ,
हर पत्ते से छम छम की ध्वनि, और बूंदों का अपना आलाप,
ये रागों से सब बुना जाल, भैरवी तान , और ताल जमा,


बस एक बार इन बूँद और माटी की बात पता कर लूं
जो मिलकर महक महक जाती, जल तरंग सा क्यों जाल इनका
हल्की सी चोट और सुर बहाव,सब झंकृत पोर प्रकृति कोना
कुछ एहसासों में बस जाए, वो अम्बर और बूद झरना,
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ये सूरज के अकेले का सफ़र क्यों ?

ये सूरज के अकेले का सफ़र क्यों ? ...

by Suman Mishra on Wednesday, 21 December 2011 at 23:42 ·


माना की सूरज है नाम, रौशनी का साथ,
सूरज और रोशनी ....कौन है ये रोशनी ?
रोशनी के बिना सूरज के नाम का क्या औचित्य है ?
पर चाँद और चादनी तो सूरज और रोशनी क्यों नही?


लोग चाद और चांदनी पे जाने कितने उलाहने लगाते हैं,
नज्मों और शायरी का सिलसिला बेहिसाब लिखी जाती है,
क्यों.....क्योंकि  चाँद और चांदनी के समय लोग खाली होते हैं
शायद  चाँद और चांदनी को देखकर कोई अलग सा एहसास होता है,,,


अब चलो आँखें खुली , क्या स्वप्न से मिलके हँसे,
क्या सत्य सा कुछ दिखा था, मन मीत मन में जब कहे,
कुछ रोशनी थी राह में? या शबनमों की बेड़ियाँ ?
छूते ही जब बिखर गयी, हल्की उबासी ले उडी...

पर बात या कुछ और है ये इतना अकेला भला क्यों,
दुनिया की इस भीड़ में ,आता बड़ा चुपचाप सा,
हर दिशा में बस शोर हो, पर ये अकेला क्यों रहा,
हर सफ़र में बस रोशनी, पे ये अकेला क्यों जला.

 
इन्तजार के लिए ना रोशनी का साथ ना चांदनी का साथ,
बस पल का इन्तजार ,जिसकी आहट किसी रोशनी से कम नहीं ,
अजीब सी खुशी का आवरण जो आता है चला जाता है
ट्रेन की सीटी की तरह ,,,किसी के आने का आगाज

मगर प्रश्न मेरा वहीं है.. ये सूरज जब आता है,..अकेला,
लोग उसके साथ साथ चलते हैं ,खुशी, गम, अकेले ,साथ,
सूरज और ये जहां...वो अकेला पर सब उसके साथ ..
और ये चाँद ..इतने सितारों को साथ लाता है अपने....
मगर.....उसकी दनिया में वो और उसके सितारे.,,,,
हम अपनी दुनिया में..स्वप्न और नीद के आगोश  में...
                      

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दीवालों पर उगे फूल भी सुरभित होते हैं...

दीवालों पर उगे फूल भी सुरभित होते हैं...

by Suman Mishra on Monday, 19 December 2011 at 16:42 ·



ऐसे तो बागानों में फूलों की है फेहरिस्त ,
माली की देखभाल बड़ी कारगर सी हो,
हर समय उनपे नज़रें, खुशबू है बेपरवाह,
दीवालों की बदिशें भी कहाँ रोक सकी हैं,


उडती है ये मद-मस्त नहीं इनका है ब्यापार,
तोड़ा जो शाख से तभी तो होंगे जिम्मेदार,
नजरों से मुलाक़ात बहुत बार हुयी है,
फूलों की भी नज़रें करम मुझपे भी पडी थीं.


दीवारों पे जमाई है इन्होने ज़रा मजलिस,

मुझको बहुत है फख्र नहीं कोई भी बंदिश,
बरसात की बूदों से इनका वास्ता रहा,
शबनम को ये पीकर हंसी का रास्ता खुला.


ऐसे तो ये दीवार बड़ी ही कठोर है,
इनपे पडी जो छाप जंग की मशहूर है,
बारूद की महक को जज्ब फूल ने लिया,
वीरों के रक्त बूँद इनमे ही मशगूल है.


अब याद है तो बस इनकी रोशनी के रंग,
पंखों की ना आवाज किसी तितली के हो संग,
बस रंग दे दिया है पुराणी दीवारों को,
पत्थर नहीं ये फूल हैं, खुसबू के ये पाबन्द...

एक पंखुरी ही काफी है ..फूल की खूबसूरती बया के लिए,,,

एक पंखुरी ही काफी है ..फूल की खूबसूरती बया के लिए,,,

by Suman Mishra on Monday, 19 December 2011 at 01:04 ·


हाँ सच ही तो है, एक पंखुरी ही काफी है ,

फूल की खूबसूरती बयान के लिए,
कोई अलहदा सोच भी नहीं सकता,
उसकी खुशबू से तर बतर बस गुमान के लिए,

बस एक खुशबुए मलाल की वो क्यों बिखर गया,
एक फूल ही तो था जो डाली से गिर गया
एक उम्र का लिहाज ,कब तक वो सजेगा,
बस पंखुरी के साथ या वो अलग रहेगा .


एक कली जो बस यूँ खिली और फूल बन गयी,
मुस्कान बन खिली जो सुगंध बन गयी,
पल पल का है हिसाब मगर बेहतरी का है,
वो सूखना भला जो वो गुलकंद बन गयी.

इंसान की भी उम्र जो लम्बी लिखी उसने,
पर प्यार के पल कुछ ही है , कुछ दर्द  लकीरें,
जीता है तिल तिल के , इसी रूप रंग से,
महलों में है बसा कही पे टूटी शेह्तीरें,




रंगों सा दौड़ता लहू, पानी सा बह रहा,
ये फूल बस पानी से ही सब बात कह रहा,
बख्शो इसे डाली पे या तोड़ो कहीं फेंको,
फूलों की बात और है इंसान की सोचो..

फेंका हुआ ,है अधमरा बनता है तमाशा,
जिसने उगाया फूल वही मन है हताशा,
जीवन है चंद रोज कहाँ वो या कहाँ फूल,
एक पंखुरी की नब्ज बता  देगी किसकी भूल.
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खुशबू स्वछन्द है...स्वतंत्र है...


खुशबू स्वछन्द है...स्वतंत्र है...

by Suman Mishra on Wednesday, 8 February 2012 at 13:22 ·
 


खुशबू स्वछन्द है ..उड़ कर कहीं भी जा सकती है,
कोई डाली ,कोई शाख इसे बाँध कर रख नहीं सकती,
इसे मन की डोर से बाँध सकते हो तो बाँध  लो,
किसी भी उड़ान के लिए हमेशा तैयार ये खुशबू


ये हवाएं जो संवाहक हैं इसकी,
एक गहरे से रिश्ते से बंधी हुयी, 
कोई अलग नहीं कर सकता इन्हें
कोई बंधन नहीं जकड़न नहीं



लिखते लिखते अचानक  ये ख़याल आया,

उसकी खुशबू का झोंका कुछ कहा उसने

कैसे ये बन्धनों के बिना जीती है
ऐसे स्वछन्द जहा तहां फिरा करती है


ऐसी बातों पे कभी गौर करें
कोई जकड़न नहीं फिर भी कभी मायूस भी है
ये हवाएं जो रुकी तो इनका क्या होगा,
उसकी खुशबू का सिरा कहाँ पे रुका होगा,



ये तो अनजान से हैं भाव मेरे कुछ तो है,
बहुत गहरी सी मगर ,काश मैं खुशबू होती
बड़ी खामोश सी सरगोशी मेरे बारे में
कोई कहता और उसने भी सूनी होती,

मैं भी बहती नदी के तीर और बागों में
कहीं गुलशन के सिरहाने कही ताडागों में
मगर ना रूप और ना रंग कोई समझेगा,
बस एक हल्की सी दस्तक..हुयी वो सोचेगा.

Tuesday, 7 February 2012

कही एक दूर बांसुरी की धुन राधा का नाम बुलाती है


कही एक दूर बांसुरी की धुन राधा का नाम बुलाती है

by Suman Mishra on Wednesday, 8 February 2012 at 00:23

कही दूर एक तान जो बहती , स्वर समीर में धुन संवरती,
पञ्च तत्व से जुडी हुयी ये , मन मयूर के मस्त नृत्य छनकती
यमुना की लहरों में बहती, आती है धुन स्वरों में बहती
बूँद ज़रा पानी की छु कर , सुन लो कृष्ण की बंसी  बजती


राधे का बंसी से बैर है, ये नारी वो नाद अद्व्येत है,
वो सुर मोहन के होंठों पर, क्यों राधे को व्यथित करे है.
एक तान जो छेड़े मोहन, सारे अंग यथावत निश्चल,
बनी जो मूरत सजी वो मूरत, एक ही टक बस राधे मोहन


स्वर लहरी लहरों  से छानकर, चाँद चांदनी मचल मचल कर
एक निशा और उसपर ये छवि, निरखत मन सानंद हो मधुकर
कल कल ध्वनि दे ताल सरोवर, मदन रति कर नृत्य मनोहर,
हृदयंगम अब एक हैं दोनों, कृष्ण और राधेय जगत वर


मन स्पंदन की गति कैसी, नहीं नियति इस जगत के जैसी
एक बार जो देख ले कोई, इस तन से फिर मोह ना सोई
नैनन द्वार से निकसत अछर, बनत कवित ज्यों युग युगांतर

निर्झर मन और शब्द अनोखे, प्रीती येही राधे की कृष्ण पर


(भाषा में थोडा बदलाव यहाँ पर)
काहे रे ओ कान्हा मोरा मन कई चुराय लियो,
भूख नाही प्यास नाही मन को बुझात है
सारी दुनिया की प्रीती पालक बने हो जभी
मोरी प्रीती नाही काहे तुमको जनाय है


मोरा मन मोरा नाही, थिरक के छूट गयो,
काहे तुम मोहिनी सी बांसुरी बजाय दियो,
एक एक पग साथ चलूँ हे मुरारी सुनो
फिर काहे रंग अलग श्याम सा बनाय लियो.

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