Tuesday, 22 May 2012

आसमा पे रहने वालों से एक गुजारिश मेरी भी है,,,


आसमा पे रहने वालों से एक गुजारिश मेरी भी है,,,,

by Suman Mishra on Saturday, 19 May 2012 at 00:20 ·

ये जीवन अनदेखा सा है,
कितने आधे अधूरे किस्से
कुछ तो दूरिया रखनी होगी ,
वरना सब एक जैसे होंगे,

वो एक कद है ,नायाब सा हीरा
,मगर अकेला बंद पिंजरे में
बड़ी  चौकसी उसपर होगी ,
क्या होगा जो पा लूं उसको



हर पल चकाचौध की बाते,
क्या ये सब मन पूर्ण करेगा
कहीं रोशनी कहीं अँधेरा
दोनों से  जीवन पनपेगा ( हर स्थिति जरूरी है)

हर पल है अहमी सी  गुजारिश,
इसीमे जीना सीखा हमने


कैसे कह दें पाँव पंख से
हम आसमा के घर में रहते हैं




सब कुछ जो उगला धरती ने
वही अन्न है मैंने खाया
हो सकता है अलग जहां का
पड़ता हो तुम पर कुछ साया

क्या ये शरीयत है बातों की
इसमें मनन ना कोई चिंता
जहां मन किया धावा बोला
ढाल लगा कर उड़ा परिंदा
           ***

मौन को मत छेड़ देना , जाने कितने रंग बहेंगे


मौन को मत छेड़ देना , जाने कितने रंग बहेंगे

by Suman Mishra on Thursday, 17 May 2012 at 23:33 ·


मौन को मत छेड़ देना , जाने कितने रंग बहेंगे
रंग बिखरेंगे यहाँ पर , मौन को कुछ शब्द देंगे
पुष्प को मत तोड़ लेना , ये स्वीकृत की नहीं मंशा
जल में तिरकर ये बहेंगे, लहर के संग चल पड़ेंगे

मौन के शब्दों की गाथा जाने कितनी लम्बी होगी
ये तो बादल सिमटा सिमटा, जल की बूंदों से भरा सा
बह गया तो धरा सिंचित , मौन मन रंग जाएगी ये
रंग परिधानों में सजकर ये हँसेगी कलरवों में



"मौन" मैं कुछ सौम्यता है ,
"मौन" संवेदन सी गाथा
"मौन" में वो सब छुपा है
"मौन" का  मर्मों से  नाता ,


किसी गहरी झील सा जो शांत सी दर्पण सा चेहरा
फिर भी मर्मों के प्रवाहों में ज़रा सा मैं गति दे दूं
मौन के गुल्लक में जाने कितनी बाते खनखनाती 
कर दूं क्या आजाद इनको , कुछ खरीदूं और यादे


मौन में रंग ? मत हंसो तुम ,
ये तराशी मूर्त जैसी
मैंने पहनाये हैं कपडे
जब तलक ये पूर्ण होगी

चल पड़ेगी राह पर ये
गति भरे शब्द साथ लेकर
साथ में यादों के पंछी
नीरवता को भंग करेंगे

(मेरी प्रिय पंक्ति)
टूटने दो मौन को अब
वज्र सी आवाज होगी
फट पड़ेंगे नभ से बादल
तड़ित दिल के पार होगी


इंद्र का सिंहासन हिलेगा
तांडव शिव का आज होगा
धरा का श्रृंगार करने
फिर से नव गंगा बहेगी,,,,,

टुकडा भी धुप का जहे-किस्मत से मिलता है (धुप छाँव )`


टुकडा भी धुप का जहे-किस्मत से मिलता है (धुप छाँव )`

by Suman Mishra on Thursday, 17 May 2012 at 00:54 ·
टुकडा भी धुप का जहे-किस्मत से मिलता है
ये चादर नहीं ऐसी की पैर ढँक ही जाएगा
अधिकार उस पे सबका है वेदों ने लिखा है 
हिस्सों में जहानत की खुशी आधी अधूरी

कोई खुशी में डूबा की  अब उबरता नहीं
अजब सा ये दौर जाने कितना जुनू है
उम्मीद भी सजग है की वो सफल हो जाए 
किस्मत की बेरुखी से कही मात ना खाए



ये प्रेम प्यार की कहा जरूरत है अब किसे
सब डूब रहे हैं किसी आदत के नशे से
आसान है हर शख्स इसे पा ही जाता है
किस्मत नहीं ये दौर कहो, झूठा सा नाता है

कुछ लम्हे खुद के साथ जो हमने थे गुजारे
खुद को गलत सही समझ चल  चित्र उभारे
थी अजब सी तस्वीर मेरी , मेरा ये वजूद
मुझसे अलग लगा मगर ये मेरे सहारे



आसान किस्तों में मिली ये जिन्दगी जी लो,
कितनी मिली हिस्से में ये मत पूछना कभी
इस  धुप छाँव पे है अधिकार सभी का
बस दोष ना देना कभी किस्मत की जमी का


जीवन के बाद भी रहेंगे साथ में उसके
ये रूह फना होगी नहीं मेरा यकीन है
बस इत्तिला मेरी येही पहचान सको तो
जन्मों से हम तुम  एक ही राहों पे चले हैं


क्योंकर हो नाराज ज़रा पास तो आओ
हालात के शहतीर आज फिर से लगाओ
बरसात में भीगोगे अगर होगा फिर एहसास
पीली सी धूप में पसीना बहा कितना


कहते है मुझे लोग ये शब्दों की बाबत से
 मिलता है मुझे बल भी उनकी इजाहत से
पर मंजिलों पे नजरों का अभी देखना बाकी
जिस दिन मिली मुझे तो मिलंगे शराफत से
                   *****
                  *****

तनिक अनमना हूँ पर जीत लूंगा सरहदों को


तनिक अनमना हूँ पर जीत लूंगा सरहदों को

by Suman Mishra on Wednesday, 16 May 2012 at 01:15 ·

घर से निकला अनमना सा,
अश्रु  माँ के ढलके तन पर
भीगा था जब मेरा कंधा,
बूँद आंसू कांटे सी बन कर

चल पडा हूँ अपने पथ पर
कर्ज है कुछ मेरे मन पर
बोझ का मत नाम देना
कर्म का आधार पहला



भर लूं आँखों में वो चेहरा
फिर ना जाने कब मिलूंगा
चल पडा हूँ सरहदों पे
जमी जो अपना है डेरा

प्यार है मुझको इसीसे
जनम मेरा इसकी खातिर
छीन लूगा दुश्मनों से
आँख से देखे जो शातिर


वज्र सा तन , वज्र सा मन ,
सर्दी गर्मी मुझको संयम
मैं खडा हूँ जिस धरा पे
इसका ही बस मान रख लू

कोई सरहद ना रहे अब
मिल जो जाए ये जमी से
अपनी दुनिया कह सकेंगे
मिलके सब इंसान भी तब


उड़ चलेंगे पंछी बनकर
सरहदों के पार हम तुम
जहां भी मन घर बनेगा
एक नया संसार हम तुम

ख्वाहिशों से बल है मिलता
एक मुट्ठी की है ताकत
हाथ में अब हाथ लेकर
जोड़ लो अपनी शहादत

हम नहीं तो क्या हुआ जग
वीर की उपाधि देगा
धरती का हर चप्पा अपना
एक हैं सब जग हंसेगा

उससे कह दो मेरे ख़्वाबों में ना आया करे,,,,(कशमकश )


उससे कह दो मेरे ख़्वाबों में ना आया करे,,,,(कशमकश )

by Suman Mishra on Tuesday, 15 May 2012 at 01:15 ·



बड़ा विस्तृत सा ये रूप या रिश्ते की थाह है  क्या
कहाँ तक सोच कर मैं खुद को अब तामील जो करू
अमलो जामा है पहना बहुत सी याद काबिज है
कहाँ तक मुद्दतों की बात का अफ़सोस मैं करूँ

अभी तक मैं नहीं उबरा , वो दुनिया एक अलग सी  थी
अजब सी मन पे रंगत थी, हरेक जेहमत शहादत थी
गुजर जाते थे रस्मों को निभाने के लिए हद तक
मेरी दुनिया में वो बस थी , उसकी दुनिया भी मेरी थी

वो था फानूस जैसा वक्त क्या बस रोशनी मंजर
ना जाने कितने रंगों के धनुष खिलते थे हर पल में
थी बाहें फ़ैली उसकी मेरी दुनिया में समाने को
मैं खो जाऊं जो गर उसमे , नहीं कोई नुमाइश थी



ना जाने कितने दर पे हम मिले शाम से पहले जा जा कर
वो सूरज अस्त होकर आ गया मिलने फिर से मुहाने पर
कई रंगों में रंगने को विछा देता था गलीचे
मगर अपनी जो बंदिश थी वही हम सोच कर बिखरे

कसम है उसकी मेरी भी , नहीं ये आजमाइश थी
बस एक हल्की सी दस्तक बंद दिलों के दर्द जैसी थी
धड़कने एक लय में थी, बस एक उसकी गुजारिश थी
हमारी बात हम तक ही रहे , हमारी भी ये ख्वाहिश थी


एक तनहा सा है ये मन, नहीं समझा ना समझेगा
ये पंखों से नहीं उड़ता , मगर अब कौन रोकेगा
जहां चाहे जिधर  जाए , पुकारे मन से ये उसको

कोई सुनता भी है इसको, घिरा खुद के सवालों से


है कुछ मालूम इसको जो कभी उसकी धरोहर थी
ये लाया मांग कर उससे बनाने अपनी किस्मत भी
ये मन के तार के जैसा जुड़ा है उसके   ख्यालों से
अजब सी एक कशिश इसमें, अजब से बे-खयाली है




सुनो...अब स्वप्न में आना नहीं तुमको  हिदायत है

बड़ी ही तपिश है इसमें , अजब सी ये नफासत है 

मैं हूँ बदला हुआ इंसा , चला जो साथ मैं उसके
वो  मेरी अलग दुनिया थी  , खोया था ये शिकायत है

वो एक स्वप्न सा हरदम दिलो गुलशन में खिलता है
उसीकी बात से हर बात की शय शुरू करता है
मैं चाहूँ अलग होकर मैं अलग अपना जहां चुन लूं
मगर वो मेरे साए की तरह मुझमे ही रहता है


"है हर जो बात ये मैं स्वप्न को अलविदा कह दूं "

मैं दूं अब इत्तिला उसको ना आओ जेहन में कह दूं
जो होगा हश्र अब मेरा , ये माना धडकनों की बात
ना आये स्वप्न में मेरे , कहो तुम या मैं (मैं तुम दोनों एक ही हैं ) कह दूं

ओ ! रे कन्हाई तूने दधि नाही खाई ,,,?


ओ ! रे कन्हाई तूने दधि नाही खाई ,,,?

by Suman Mishra on Monday, 14 May 2012 at 17:42 ·


माँ की ममता .....वात्सल्य  ..कृष्ण यशोदा से भी सुंदर कहीं मिलता है बोलो ?

ओ ! रे कन्हाई तुने दधि नाही खाई, ?

बांसुरी की धुन ने मुझे बात ये बतायी
रूठ गयो मोसो काहे, काहे मुंह फेर लियो
बोल दे ओ ! कान्हा देख,  माँ ने हाथ जोड़ लियो


तेरी बांसुरी भई, तेरी ही सहोदरी अब
माखन वा से मांग लियो, मन्ने अब ना दोष दियो
शिकन तो तेरे मुख तनिक सौ तो आयी नाही
मन मुस्कात कान्हा , माँ ने ली बलैया जानी




बैठी छाँह कदम के, माँ यो मनुहार करे,
छोटो सो कान्हा मेरो, मैं काहे ना लाड़ करू
जगत दुलार जैसो, माँ को ये दुलार न्यारो
खुद नै लुकाय लियो, शिशु कान्हा प्यार बाढ्यो

कैसो मात, कैसो सुत, निरखत ज्यों जीव जंतु
मन को सम्मोहन में सबही ने भरमाय लियो
आयो रूप धर के ज्यों लीला पै यूँ लीला कीन्ही
बाल रूप सूर भाष्यों , अंखियन में समाय लियो.



रोज रोज मनमानी , कितनी ढिठाई करयो
गोपी संग तोड़ फोड़, मटकिन गिराय दियो
छुप छुप बाट जोहत , गोपी गृह माखन लै
गवाल बाल सबहीं के मुख लपटाय दियो


चोर ये चकारो सारो, करै सब गुहार देखो
मोहनी सी मूरत सो चेहरों बनाय लियो,
देख देख लीला न्यारी , मन में समाय जात
कान्हा ये मुरारी मेरो , माखन चुराय खात


आज दधि खाई नाही, बड़ी है कमाई मेरी 
सारी सारी गोपियाँ की आयी है दुहाई तेरी
तेरो मन वाको संग , रम गयो जानू मैं
दीप से पतंगा जैसी प्रीत वा लगाईं आयी

मान ले ओ ! कान्हा तेरो ऐसो उत्पात हियाँ
दिन रात नन्द बाबा सब नै सुनायी कही
कित्ते युग बीत गयो , पर ना पुरानी भई
बाल कृष्ण कान्हा कथा सब ने जुबानी लई

रिश्तों के त्यौहार,,,,,( माँ - on mothers day )


रिश्तों के त्यौहार,,,,,( माँ - on mothers day )

by Suman Mishra on Sunday, 13 May 2012 at 21:38 ·


होली , दीपावली ,दशहरा ,ईद ,और क्रिसमस तो सूना था
अलग प्रान्तों के नव वर्ष भी ना अनसुना था
लोगों के अपशब्दों में रिश्तों को तौलते हुए गुना था
जाने कैसी ये दुनिया तू तू मैं मैं में सुनकर ये मन अनमना था


आज रिश्ते सड़क पर चलते ही बन जाते हैं
पड़ोसियों से ठन गयी तो तम्बू उखड जाते हैं
अब इन रिश्तों के कोई माने शहरों की दूरियों में गुम हुए
इसीलिए इन रिश्तों की याद के लिए कुछ कार्ड छप गए


माँ का दिन भी अब मुक़र्रर हो गया है लोगों
कम से कम एक दिन तो याद कर ही लो उसे
ये शब्द जो धरती , और अम्बर से जुड़ा है
ये शब्द जो तन मन में झरोखे सा बुना है

जो छाँव है ममता की साए की तरह है

हर सांस कर्जदार जिसकी दुवावों की तरह है

हर वक्त हमारे लिए जीती है वो ताप कर
अब दिन मुक़र्रर कर दिया रिश्ते में बंधी है
 

अब क्या कहूं माँ शब्द पर मुझको नहीं है थाह
ये धरा , धरनी , धरती से हरदम जुड़ा हुआ
अंकों में पल के हमने सीखा था जब उड़ना
लो कर दिया मुक़र्रर एहसान  का एक दिन


ये दूरियां लम्बी हुयी , दिल दूर हो गया 
काढा जो माँ के हाथ का दूभर सा हो गया
अब तो समय की शागिर्दी घडिया मंहगी सी
कर के किनारा माँ से डिप-डिप चाय बन गयी


कुछ पल ही अब सही मगर वो स्वर्ग लगता है
हाथों से माँ का सर पे जब स्पर्श लगता है
हाथों की लकीरों से बड़ी सड़के , नौकरी
हर दिन ही बात की मगर ये दिल पत्थर का लगता है

ये रस्म अदायगी सभी दस्तूर खा म खां
इश्तिहार में छपने लगा अब माँ का सहारा
वो कौन सी जमी है जिसपे माँ नहीं होती
फिर दिन मुक़र्रर कर दिया ये किसकी बपौती