Wednesday, 30 May 2012

कोई तकल्लुफ नहीं दोस्ती में , मगर एक दीवार भी है ..


कोई तकल्लुफ नहीं दोस्ती में , मगर एक दीवार भी है ..

by Suman Mishra on Tuesday, 29 May 2012 at 00:47 ·

कोई तक्कल्लुफ़ नहीं है दोस्ती में
मगर एक दीवार भी है
कैसे कहें हम ये बात
अपना मिलना बस बे-अख्तियार सा है

कल तलक यूँ ही जुमलों में हम मशगूल रहे
एक हद तक किन्ही बातों से तवारूफ करें
अभी तो जानना है बहुत कुछ की बात का मंजर
एक वो आदमी कई दिन से उससे मसरूफ रहे

कभी कभी मुझे हवा की सरगोशी कहती है
कोई एक दास्ताँ दस्तकों में मिलती है
सर्द झोंके से एक हल्की चपत के जैसे
कुचले फूलों की खुशबू में पैरों की सैर सुनती है



कभी कभी जब खुला आसमान यूँ ही  खाली हो
कोई परिंदा ना हो तैनात  इसकी बे-खयाली हो.
मेरी जरूरत हो गर महसूस तो  समझ लेना
ऐसे लम्हों में तेरी याद मन सवाली हो ..


ये दुनिया सैरगाह और हम मुसाफिर से

अपनी ये दोस्ती भी इनसे परे क्या होगी
कोई दीवार का पैबंद अगर लग भी गया
एक हल्की शिकस्त  होगी और क्या होगा


अगर ये दोस्ती की हद को मुकम्मल कर दो
दोस्त के नाम से मुझको ज़रा मशहूर कर दो
नहीं जुड़ पाएंगी ईंटें किसी दीवारों में
थाम कर हाथ आज तुम मुझे मगरूर कर दो,,,,

नुमाइश या मजबूरी


नुमाइश या मजबूरी

by Suman Mishra on Saturday, 26 May 2012 at 01:37 ·

जहां देखो नुमाइश का दौर है यारों
कोई चिट्ठा कहीं कच्चा या पका है यारों
बिना इसके कहीं कोई तिजारत मुमकिन नहीं
कही पे दिल, कही दिमाग का खेल है यारों

आज कुछ लोग नुमाइश का दम भरते हैं,,
किया कुछ भी नहीं बस यकी लोग करते हैं
हम तो शब्दों में चाँद तारे टांक सकते है
एक पैबंद ना खुल जाए आँख रखते  है

 

किसी ने एक वक्त पेट भरा खुश हो गया
किसीने खींच ली तस्वीर एक रस्म हो गया
दिखायेंगे , बनायेंगे नया जहां इससे
खींच दी क्रांति की लकीर और खुश हो गया

कहीं रंगों में , कहीं लेंसों में कैद तंगहाली
कहीं अखबार के पन्नो में लिखी बदहाली
कहीं  टीवी में दिखी दासता गरीबी की
कहीं सड़कों पे विछी बच्चियां करीने से



कोई भी तूलिका जादू नहीं दिखा सकती
प्राण तस्वीरों में वापस नहीं वो ला सकती
काश वो रूप नया नक्शा कुछ बना सकती
राम और कृष्ण को वापस धरा पे ला सकती

आज हालातों की नुमाइश करो और पैसा लो
इनके चेहरे में ज़रा रंग भरो पैसा लो
खुद को नारी से पुरुष का कोई किरदार करो
अपने ईमान को ताखे पे रखो पैसा लो
              ****

मन विहग सा फिरता अम्बर , पाँव हैं पर पत्थरों पर


मन विहग सा फिरता अम्बर , पाँव हैं पर पत्थरों पर

by Suman Mishra on Friday, 25 May 2012 at 01:01 ·



मन विहग सा , उड़ता रहता बादलों के संग गगन में,
मैं हूँ धरती  तुम हो अम्बर, नहीं मिलना इस जनम में, 
जाने कितने साहिलों को छु के गुजरी नदी हूँ मैं
पर लहर का आना जाना यूँ ही है जल के सघन में

पंख  का विस्तार कर दूं, या समेटूं खुद में खुद को
धरती से अम्बर की दूरी ना बढ़ेगी ना ही हो कम
आशा के पंख बढ़ रहे हैं, इनको मैं एहसास कर लू
लहर का आना और जाना , संग इनके मैं भी चल दूं

 

उड़ने की आशा से तिश्नित मन की भाषा लहर जैसी

जाने क्या वो ढूढती है, अनगिनत प्रहरों  सी तट पर
जाने कितने अब थपेड़े सहेगा  तट  ना हो क्रंदन
ढूढती हूँ इसके आंसू, सीपों में मोती अकिंचन 


हर तरफ अवसाद फैला, मिलन का उपहास फैला

लहरे साहिल से मिली जब , कुछ नहीं आभास फैला
तट की सीमा वही तक है जहां तक लहरें नहीं है
ह्रदय से मन क्या कहेगा , जहां यादें बलवती है


समय धरती और हकीकत सूना है सब नष्ट होगी
फिर जनम होगा सभी का या ये सृष्टी विलुप्त होगी
अब नहीं पनपेगी धरती , कितनी शलाका दग्ध होगी
फट पड़ेगी ज्वाला बनकर, सूर्य जैसी ये दिखेगी

इसलिए है पंख बांधे गगन से कुछ बात कर लूं
कुछ जमी और जल की सीमा दोनों का सन्देश दे दूं
नहीं अपनी बे-गुनाही , पर ज़रा फ़रियाद कर दूं
आसमानी कुछ फ़रिश्ते , इंसा की बुनियाद रख दूं
                         ****

दुविधा .....मेरे मन की


दुविधा .....मेरे मन की

by Suman Mishra on Wednesday, 23 May 2012 at 12:17 ·

अभी तो बस ख़ामोशी सिल दी
सिलन खुली तो गर्जन होगी,
बाँध बनाकर रोक दिया है
वरना वेग प्रलय सी होगी

कुछ पत्तों को चुनकर मैंने
आग ताप ली पेड़ के नीचे
आंधी से जब हिलेगी शाखा
टूट गयी तो जड़ रोएगी



शंख बजे तो हृदय दुदुम्भित
लहरों में बहकर आया  था ,
है अमृत मुख से लगने दो,
पर जीवन की बात ना करना 


जल की सीमा ख़तम हो रही
कश्ती में पहिये लगने दो ,
अब इंधन की बात ना करना
फुकनी से लकड़ी जलने दो.



अन्न मिला तो पचना मुश्किल,
जूते फटे तो चलना मुश्किल,
पथ पे धूल, परत पत्तों की
पतझड़ से सड़कें बिछने दो

ये गति है जीवन में आगे
क्या मैं बड़ा और तू छोटा
एक रास्ते चलते हैं हम
बस कुछ शब्द अभी कहने है 

Tuesday, 22 May 2012

शब्द से निर्माण कर, कर्म से आह्वान कर


शब्द से निर्माण कर, कर्म से आह्वान कर

by Suman Mishra on Sunday, 20 May 2012 at 15:36 ·

शब्द से निर्माण कर,
कर्म से आह्वान कर
पंख काटे जो विहग के
नया आसमान कर

उसका जो  आंचल फटा है
तनिक ना अपमान कर ,
पग उठे जो आगे बढ़ जा
अब नहीं अवसान कर



सोचने दे मुक्ति का पथ
इतने झंझावत यहाँ
कौन कहता है ये अपना
अहम् का विराम कर


रक्त का प्रवाह बढता
लहर दर लहरों से रिश्ता
ये उफनती नदी तत्पर
मुश्किलों का भान कर,



बचपने की याद मत कर
पलों का हिसाब मत कर
भूलकर बीती सी  दुनिया
नए युग का मान सत कर

हर तरफ एक ताजपोशी
इंसां को फरमान मत कर
आँख खुलते हाथ सत्ता
सब यहाँ बलवान विषधर

 

शंख से हुंकार लेकर
बांसुरी की  नाद भरकर
धनुष  की टंकार सा मन
शत्रु से ललकार तू कर

शत्रु जो बस  हारता है
वीर वो जो मारता है
मन का जीता जीत सबको
एक अमोघ हथियार बनकर

आज रंग बरसेंगे बूंदों में अलग अलग, राग थी मल्हार तान आस ने लगाई है


आज रंग बरसेंगे बूंदों में अलग अलग, राग थी मल्हार तान आस ने लगाई है

by Suman Mishra on Sunday, 20 May 2012 at 00:39 ·




आज रंग बरसेंगे बूंदों से अलग अलग ,
राग थी मल्हार तान आस ने लगाई थी
दीपक की रोशनी में बूंदों के नृत्य देख
भैरवी की तान आज किसीने सुनायी है

स्वाती की बूँद ताईं बैठी वो त्रिश्नित सी
कूक थी पपीहे की प्यास ना बुझाई है
आवत जो दूर से बटोही नैन चमक गए
चला गया अनदेखा धूर आँख में समाई है


भीगा मन भीगा तन रंग रंगे ठाडी हूँ ,
अलकन ते पलकन पे काजर संवारी हूँ
देहरी से उपवन तक नयनो ने राह तकी
पाँव के निशान रंग पैरों से  छाप आयी

मन को मयूर और मधुबन की पांखी से
प्रीत रीत जोड़ जोड़ पंख सा उडाये जा 
राह की उजास आज सूरज की लाली से
आवन की खुशी में तू महावर सजाये जा




दोनों नैन दीप जले , बाती ना तेल बिना
मन की ये आस श्याम प्रीती से बढाए है
रंग की फुहार आज मेघ गजब बरस गयो
पात सरिस डोले  मन  हूक सी जगाये है

येही व्यथा येही कथा जनम भया नारी का
देहरी जो लांघ गयी हुयी बस परायी है
जीवन में आस लिए , मिलन पी का साथ लिए
प्रतीछित वंदना  सी स्वरों में समाई है,,,

आसान जिंदगी किस्तों में बंट गयी , कुछ सांस बची है आँखों के आसरे


आसान जिंदगी किस्तों में बंट गयी , कुछ सांस बची है आँखों के आसरे

by Suman Mishra on Saturday, 19 May 2012 at 15:26 ·
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आसान जिन्दगी किस्तों में बंट गयी ,
जो कठिन थी वो खुद की खुद में ही रह गयी
अब साँसों की जागीर में रहते हैं सिमटकर

वो जिन्दगी थी किसीकी ये जिदगी है और


आसान थी राहें आसान था जीना
मंजिल के पास आ उम्र ही निकल गयी
अब लोग पूछते है कहो तुम यहाँ कैसे
हमने भी कह दिया हम खोज में निकले



एक मोड़ है आगे मुड़ जाना है हमको ,
था काफिला वहाँ अब सफर तनहा है
मालूम है सबको कल तलक भीड़ थी
चलते बने हैं सब अब साथ छोड़ कर


कितने बही खाते सब मेरी विरासत ,
पन्नो के पुलिंदे उड़ते हैं हवा में
ये दौर नया है, पर दर्द पुराना
रिसते हैं मेरे जख्म पर दीखते नहीं



अब ये जहां महफूज या वो जहां माकूल
कल तक जो साथ थे ,अब तनहा है दस्तूर
इस जहां से उस जहां - रत्ती सा फासला
रह जाएगा बस ठहर थोड़ी उम्र बितानी है 


दौड़े थे साहिल पे कभी ना मापयंत्र था  
धरती पे पैर थे मेरे पंखों का बाना था
उसने यहाँ भेजा था हमें जी लूं जिन्दगी
अब चंद साँसे है मेरी उस पार जाना है
                    *****