Thursday, 12 July 2012

लो एक दिवस फिर बीत गया इस मन की आपा धापी में


लो एक दिवस फिर बीत गया इस मन की आपा धापी में

by Suman Mishra on Thursday, 21 June 2012 at 00:45 ·


लो एक दिवस फिर बीत गया
इस मन की आपा धापी में
अब स्वप्नों में श्रृंगार करू ,
लौ बुझी नहीं है बाती में

रोशनी प्रखर मन में घूर्णित
हर पल का सार समायोजित
कल आँखों  के खुलते ही मन
भागेगा मिलने कर विस्मित


खट्टे मीठे तीखे अनुभव ,
मन खुश है कुछ अपना सा लगा
इस लाली के रहस्य ने  ही
इस मन का राज छुपा रखा 

हर रोज मैं इससे मिलता हूँ
कुछ दृश्य की बाबत जान सकूं
पर प्रेम की परिभाषा ऐसी
सम्मोहन मन ना भान सकू



कोई स्पर्श नहीं फिर भी
कुछ गहन बात इस प्रेम में है
जाने कितने कारण इसके
अनबूझ पहेली लगता है

हर बार नया दिन आता है
पर हर दिन सूरज एक सा ही
फिर प्रेम की बात अधूरी क्यों
तरकीब चाँद  दे जाता है



मानव मन चंचल होता है
हर तरफ सुकून की बातें हैं
रोयें रोयें में हुक्म भरा
तामील भरी हर रातें हों

अफ़सोस सुकूनी सरहद पर
आपा धापो उसकी मर्जी
हम चैन से सोकर उठे अभी
वो करवट ले कर हंसता है ,,,,(इश्वर का लेखा  )

पहली बारिश एक बूँद की ...धरा और मानव सब त्रिश्नित


पहली बारिश एक बूँद की ...धरा और मानव सब त्रिश्नित

by Suman Mishra on Wednesday, 20 June 2012 at 01:21 ·


पहली बारिश एक बूँद की , मानव और धरा सब तिश्नित
कमल पंखुरी सूख गयी है, भवरे बंद दलों में भर्मित
धरा ताकती प्यासी आँखे लगा टकटकी देख रही है
कब जल की अब धार गिरेगी, बूँद सूख गयी छन से गिरकर


मडराते बादल क्यों आकर क्या ये जायजा लेने आते
कितना जीवन तड़प रहा है, दूर दूर तक धुल उड़ाते
पग कंटक से लगे तो क्या है जल लाना भी  बहुत जरूरी
एक कारवां निकला घर से, दूजे की जाने की बारी




कुछ शबनम की बूंदों ने शब् को आकर था डेरा जमाया
गीली सी पंखुरियां सुरभित, मीठी सी खुशबू  की माया
जब तक जाल रश्मि का ना हो रुक जायेंगी थके पथिक सी
फिर चल देंगी अपने रस्ते , जहां से आयी नेह निभाया

ओ ! बादल क्यों नभ पर ठहरे ,बरसो अब तो धरा पुकारे
शबनम से आकर ठहरे हो , एक बूँद के  बादल जैसे
जीवन कब तक ब्याकुल होगा, नभ भी तो पूजा स्वीकारे
कैसे आयेगा वो मिलने इन्द्रधनुष की सीढ़ी  बनने



हर पुकार में जल की आशा , पुष्प और पत्तों की भाषा
जन जीवन में जल की परिणित, एक बूँद अधरों की शाखा
आंसू जल के स्वेद चमकते , हर जीवन त्रिश्नित है हर पल
समय से ना बरसे जो बादल ,फिर कैसा ये कर्म का अर्पण


शहर गाँव का धू धू जलना , सूर्या प्रखर किरणों का तपना
अब कुंदन सा कौन बनेगा, जहां राख का जारी झड़ना
किस मकरंद से विहग तृप्त हो, फल की आशा कौन करेगा
एक बूँद स्वाति की जैसे ये विशाल जन कहाँ गिनेगा



"आहटे मौजूद हैं जानी भी है पहचानी भी है...मगर वो आहट नहीं साया कोई >>>>>>


"आहटे मौजूद हैं जानी भी है पहचानी भी है...मगर वो आहट नहीं साया कोई >>>>>>

by Suman Mishra on Monday, 18 June 2012 at 11:56 ·



आहटों का दौर है  हर बात आहट से शुरू है

इन्तजार उसका उसकी आहटों से ख़तम हो
जाने की तो बात क्या वो गया है मुख मोड़ कर
एक पल में ही मुड़ा वो मौन का घर तोड़ कर



आहटों में शब्द का व्यंजन बड़ा ही  अलग है
स्वर की पहचानो में कुछ मध्यम कहीं ऊंचा रहा
हर जगह गतिमान है दिन रात का ये शहर भी
सो गया इंसान तो आहट का मंजर और था
 


शब्द की माला बनाकर पहन लूं मैं उसकी खातिर 
कोरे पन्नो को सजाया छुप के मैंने उसकी खातिर
ये चला उड़ कर वहाँ पर जहा उसका रास्ता था
आहटों में अब मैं ढूढूं  उसके मन का वास्ता जो था

अजब सा संयोग है ये, यहाँ से उसको मैं बांचूं
उसकी हर तहरीर दिखती आँखों के कोरो में जांचूं
पत्र की मियाद उतनी ये गया वो लौट आये
आहटों की परख मुझको भीड़ से उसको मैं छाटूं


मन के अंतर में दबी है आहटें अपनों की जज्बित
ये कथा सी याद रहती हैं हमेशा खुद में संचित
शोर कितना भी हो कैसा मन वही पे जा के रुकता
लेके आता है कहीं भी आहटों के बिन वो छुपता

स्वप्न में भी उसकी आहट अकन कर मन सजग रहता
आँख गर ये ना खुली तो , वो भला कैसे मिलेगा
चल ज़रा आवाज दे लें ,कोई आहट क्यों ना आयी
भूल कर वो बदल जाए , अपने सुर उससे मिलाये



मगर कुछ आहट नहीं बस मौन के घर से हैं आती
साया सी वो हर तरफ से साथ में   चलती ही जाती
मन विरक्ति और विशादित ना ! नहीं ! वो क्यों है आती
लौट जाने को कहो उनसे , जो असहज भाव लाती

खुद नहीं उनको समझ है मोह से मानव भरा है
वो निरंकुश प्रस्तरों सी उस पे छैनी हैं चलाती
छलनी हो जाता ह्रदय ये, मगर कोई सुन ना पाता
अंत में हर आहटों से छूटता है जग का नाता

नाकाम इश्क.....यादों की धरोहर


नाकाम इश्क.....यादों की धरोहर

by Suman Mishra on Saturday, 16 June 2012 at 01:49 ·
 

नाकाम इश्क   यादों की धरोहर ,
छुपा हुआ कुछ तीर नज़र का,
हर पल जैसे रंग बदलता
इन्द्र धनुष हो  बारह रंग का

कोई चाभी नही है इसकी
जब मन हो बंद हो जाते हैं
एक बार जो मन की दस्तक
खुद ताले यूँ खुल जाते है




हर लम्हा उसको जीता हूँ
मौन से मैं बाते करता हूँ
कुछ यादों के पंख सुनहले
जोड़ जोड़ कर उड़ लेता हूँ


एक सुरंग और मैं तनहा
दुनिया भी तनहा लगती है
धड धड करती रेल की पटरी
जहां पे कल थी, वही पडी है

मैं भी इनके जैसा इस पल
उस पल यहाँ वहाँ जा आया
आखें ,मन सब कही अलग थे
पर मैं येही या मेरा साया




इन यादों का येही बसेरा
लिपटी हैं ये बेले बनकर
मैं स्थिर सा अचल खडा हूँ
याद की बारिश मन के तीरे

एक धरोहर  हैं जन्मों की
मिलना और विछ्ड़ना जारी
नए रूप पर याद वही है
हर जन्मों की एक कहानी




मत सोचो ये लोग हैं कहते
क्या साँसों को रोक सकूं मैं
सांस जो मेरी शब्द बने तो
पूरी कहानी सुन लेना तुम

एक झोंके से उड़ा ले गया
दूर दूर तक पता नही है
तरु के तट पर बैठ पथिक वो
खुद को खुद में ढूढ़ रहा है

मैंने चाँद को चाहा था पर सूरज ने साथ निभाया मेरा


मैंने चाँद को चाहा था पर सूरज ने साथ निभाया मेरा

by Suman Mishra on Friday, 15 June 2012 at 14:10 ·




मैंने चाँद को चाहा था, पर सूरज ने साथ निभाया मेरा
चाँद चांदनी दोनों ही थे , मेरे साथ ना रहा अकेला
बादल ओढ़ के सूरज ने बन चाँद किया था मेरा फेरा
मैंने तब मुख फेर लिया था , कसम दिलाई हुआ सवेरा,,,


कभी निशान्वित कितनी बातें, चाँद ने सुनकर भरी थी हामी
कुछ कहने सुनने में बीती , रात चांदनी बस मनमानी
कैसा रिश्ता धवल चांदनी मै क्या जानो मेरा है वो
वो भी तो पूरा था उस दिन , आधा बंटा प्रेम की हानी



तिरते चाँद का अक्स अजब सा जल में लहराता मंधिम सा
चांदनी की थी  शाल फैलाई सोया था उस रात जमी पर
जिसने देखा वही नहाया , वो है सभी का पर ना मेरा
वादा जो उसने किया था, नाम का ही पल में था तोड़ा





सूर्य की ज्वलित आभा , कोमल स्पर्श लाल 
अक्स उसका छणिक सा ही मन की तासीर अजब 
सारे दिन फैला जाल   तम का करता  शिकार 
मन को ऊर्जान्वित कर, चाँद भी है उसका ढाल

दिन के भुलावे में, हलचल बाजारों में
फिरता है मन पांखी, कर्म कारागारों में
कोशिश भी जारी है, चाँद वांद भूल गया
दिवस और सूर्य आज , साथ सभागारों में



       धराशायी मन
कर्ता वो धर्ता वो खेल बस निराले हैं
उसकी हर रचना अटल, हम तो निवाले हैं
मैंने क्या चाहा और उसने है सोच लिया
उसको जो करना था , करके मुख मोड़ लिया

अंतहीन तथ्य है ये सूरज और चाँद अटल
इंसान मन भाव पथिक,ऊपर के नियम सख्त
मेरी जो चाह बनी , जुडी है उसी से कही
माना की नाम अलग. मगर वो कहाँ है बिलग,

एहसानों का दौर है ये , कुछ बात करो अरमानो की


एहसानों का दौर है ये , कुछ बात करो अरमानो की

by Suman Mishra on Wednesday, 13 June 2012 at 11:08 ·


एहसानों का दौर है ये , कुछ बात करो अरमानो की
जिसमे मेरे सपने अपने, और तुम अपने नजरानो की,
कहते हैं लोग तुम ना होते ,फिर मेरा क्या होता बोलो
मैंने खुद को आगे रखा , अपनी शेखी पहचानो की


वो नाखुदा दिखा ना तब ? जब पैरों में छाले फूटे थे
अब आये हैं तोहफे लेकर , बन मिसाल मेहरबानो की
वो सरहद पर  हम अपने घर पर, दिल में खौफ भरा मेरे
एहसान देश पे उसका है , मेरा घर के दरबानो पर



सर ऊंचा कर हम चलते हैं, संयम वाले तो हम भी हैं
जब रक्त बहा उन वीरों का, कुछ बात ज़रा हम्मे भी है
बस मौक़ा आने दो ,घूघट के पट खुल जायेंगे
ये तीर नज़र ज्वाला बनकर बरसेगी शत्रु पर तीरों सी,


मत कह देना अबला जैसी, ये रक्त हमारा लाल ही है ,
अरि का मस्तक झुक जाएगा, इस देश की शान प्रणाम ही है
कब तक वो वार करेगा यूँ, अंदरूनी ताकत सोएगी
अब जाग रहा है मन पौरुष , जीवन सस्ता बस आन ही है 





कितने भी देश विदेशी से हम लगें मगर ये ह्रदय अलग
ये पाँव लगे हैं धरती से, इसकी गरिमा मन मस्तक पर
ये स्वप्न नहीं जो टूट गया , ये अपनी एक हकीकत है
हर काम अलग सबसे पहले ,मन प्राण से इसकी इबादत है

क़दमों को ठोकर लग जाए मत रुकना देने सहारे को
हम खुद ही से उठ जायेंगे , आगे समतल या पहाड़ों पे
बस आने दो उस समय को तुम जो शाब्दिक रेखा खींची है
अछरशः सत्य कहा मैंने , हर हिन्दुस्तानी वालों से

पैबंद कपड़ों पर या शब्दों पर


पैबंद कपड़ों पर या शब्दों पर

by Suman Mishra on Monday, 11 June 2012 at 00:54 ·


बड़ा ही कठिन शब्द जिससे दूर ही रहना
वरना ये जिन्दगी में बढ़ते ही जायेंगे

एक बार गर लगा तो फिर आसान नहीं है
अरमानो के हैं खून ,कोई अरमान नहीं है

ये तो दिखा ही देगा की हम किस जगह खड़े
पैबंद लगा लिया, कोई एहसान नहीं है



कल सड़क पर बिखरा हुआ एक घोंसला देखा
तिनकों से था भरा , मगर पंखों से था सिला

खुद के ही तन से निकला हुआ टुकडा  लगाया
इंसान की बाबत , ये पैबंद से नुमाया

कुछ भी हो मगर इससे शर्मसार नहीं है
बिखरा है ये हवा से, पर अधिकार अब भी है




माना की वो गया है बहुत दूर अब मुझसे
लौटेगा या नहीं बस इन्तजार हो गया

मेरी निगाह में मेरी तासीर कुछ ऐसी
ये जिंदगी परिंदा मन रुखसार हो गया

कुछ रिश्तों में पैबंद लगा कर ही रोक लो
वो गया और आया एक ब्यापार हो गया
              *****