Sunday, 31 July 2011
सांवरो कान्हा
काहे सांवरो तू कारो, कैया राधे मतवारी,
सारी सुध बुध थारे पाछे है भुलाय गयी,
गोपियन की कतार बाँध के जलाय रहयो,
कैसी सुकुमारी कलि देखो कुम्हलाय गयी,
ठाकुर बनेगो कैसे , ठकुराई कौन जाने,
झूठ मूठ नाम थारो, जग मैं थिराय गयी,
देखत है राह राधे, राह थारी लम्बी भाई,
राह को जो राही सब राह तो गुमाय गयी,
मति भ्रम म्हारो भयो, राधे तो है भूली गयी ,
दुनिया की मति मैं तो तुम्हीं समाय गयो ,
राधे,मीरा बावरी है, जाने कित्ते द्वार खडे,
सांवरो और कारो रंग, सर्वस्व बिसराय दियो.
आजादी या दासता
चलो आज फिर से आजाद हुए पांखी,
उडे हैं उडाये गए हैं आसमान मैं,
छुआ है हवा को उन्मुक्त खुले मन से,,
मिले हैं थे तडपे स्वछंद हैं ये पांखी,
...उडे हैं ना रुकते कहीं ठौर पर भी
हैं उडते धवल से . बने शान्ति अग्रिम ,
था जीवन बड़ा ही सरल सा पिंजरे मैं,
कोई कर्म ना था, बेकार था ये पांखी,
अभी उड़ चला ये, तो कोशिश करेगा,
खुद अपना और संगी का दम भरेगा,
मिलेगा जो मेह्नत से वही बाँट लेगा,
दिलों मैं जगह अब वो घटने ना देगा,
कभी एक इंसान से पूछो ये बातें,
कभी दास्ताँ थी ,बड़ी लम्बी रातें,
मगर कुछ तो बाकी अभी रह गया है,
मिली है आजादी, येही वाकया है,
कुछ रस्मों रिवाजो को हम पालते हैं,
सुरों मैं सभी आगाज ढालते हैं,
मगर अब भी बाकी, आजादी नहीं है,
उड़ा है गगन मैं,पंख बाकी एहीं हैं
उडे हैं उडाये गए हैं आसमान मैं,
छुआ है हवा को उन्मुक्त खुले मन से,,
मिले हैं थे तडपे स्वछंद हैं ये पांखी,
...उडे हैं ना रुकते कहीं ठौर पर भी
हैं उडते धवल से . बने शान्ति अग्रिम ,
था जीवन बड़ा ही सरल सा पिंजरे मैं,
कोई कर्म ना था, बेकार था ये पांखी,
अभी उड़ चला ये, तो कोशिश करेगा,
खुद अपना और संगी का दम भरेगा,
मिलेगा जो मेह्नत से वही बाँट लेगा,
दिलों मैं जगह अब वो घटने ना देगा,
कभी एक इंसान से पूछो ये बातें,
कभी दास्ताँ थी ,बड़ी लम्बी रातें,
मगर कुछ तो बाकी अभी रह गया है,
मिली है आजादी, येही वाकया है,
कुछ रस्मों रिवाजो को हम पालते हैं,
सुरों मैं सभी आगाज ढालते हैं,
मगर अब भी बाकी, आजादी नहीं है,
उड़ा है गगन मैं,पंख बाकी एहीं हैं
काश अपुन भी होता इस नोट के ऊपर छपा हुआ,
रविवार के दिन ही चलता, मेरी फोटो का नोट ये,
अपुन छापता दिन भर इसको, रात को शौपिंग करता,
हर शौपिंग काम्प्लेक्स मैं बस अपना ही जलवा रहता,
नोटों की थैली लेकर हम जब भी बाहर जाते,
हाथ बांधकर खडे सभी हो, जोर सलामी देते,
मेरे नोटों से ये शहर का कारोबार सब चलता,
सन्डे का दिन नाम हो अपना, अपुन कर चर्चा चलता,
नोट वोट सब मैल हाथ का, हम भी तुम भी जाली ,
सब उपवन है सजा इसीसे, हम सब इसके माली,
भरी तिजोरी सेठ वही है, इनसे सी है सब बीमारी,
जय जय बोलो नोट छपे जब, बाकी सब रेजगारी.
Saturday, 30 July 2011
एक सबब प्यार का
एक सबब प्यार का, कुछ तो है बात ये,
हो ही जाती है क्यों बात बिन बात के ,
अपनी यादों को रख दर किनारे कहीं,
आ ही जाती है याद ये बिन बात के
हमने देखा है जो उम्र के मोड़ पर,
हैं खडे वो छितिज़ की तरह याद मैं,
जाने गुम हैं कहीं,कहीं मशगूल है,
उनको आवाज दी ,बोलते ही नहीं.
ऐसे दुनिया मैं रिश्ते हैं बनते मगर,
प्यार ऐसा है जो ,बात होती जुदा,
उसकी यादें है तनहा समा साथ मैं,
सूख जाती हैं आँखें फुहारों के साथ मैं.
अब तो ऐसे हैं वो, एक शिला जैसी है,
कितने दिन के शगूफे जेहन मैं पडे,
कब तलक आग दबके रहे उनमें यूँ,
देखते हैं उन्हें जलते अनल की तरह.
इसलिए बारिशों से तवारुफ़ करें,
उसकी बूंदों से जलने की आदत जो है,
भाप बनकर उडी उसके तन से छुई,
आग बूंदों की माफिक चमक सी गयी .
खुशबू की सबा
अनोखी सी शिद्दत अनोखा सा मंजर,
ये दिल है धड़कता बिना बात ही क्यों
नहीं हमको मालूम ये शग्ले तब्बसुम,
बिना बात ऐसे महकता है क्यों ये,
कहीं गुल अमलतास के हैं बगीचे,
कहीं कोई महकती कली खिल गयी है,
कहीं कोई गुजरा किसी जंगलों से,
हवा बह के आयी मेरे पास ही क्यों ,
महकते हैं हम जाने किस बयार से ,
कहाँ से वो आती जाने किस दयार से.
एक पल को लगा हम कहीं खो गए हैं,
अभी ही तो रुखसत हुए उस बहार से हम,
"दुश्मनी"
दुश्मनी की ये बाबत कहें क्या कहें ,
हमने खुद से ही खुद को अलग कर लिया,
बाड़ से सब अलग, दूरियां बढ़ गयी,
जो थे रिश्ते सभी, बंदूकें तन गयी,
अब तो लम्हों ने जो फैसला कर दिया,
सदियों को भी रिवाजों से सहना पडा,
कुछ चले भी अगर, रोक कर फिर वहीं,
उनके पैरों को तालों से सीना पडा ,
दुश्मनी दुश्मनी क्या कोई जात है?
ये दिन है यहाँ वो कहें रात है,
इतनी खाई बड़ी , जो पटेगी नहीं,
कितनी मिट्टी पडी पर अड़ेगी वहीं,
दूर से बस हवा को सलामी ही दो,
वो जो अपना कभी ,अब पयामी तो दो,
वो भी खुश है वहां , हम भी कोशिश करें,
दुश्मनी को ख़तम , दोस्ती नाम दें.
बाड़ से सब अलग, दूरियां बढ़ गयी,
जो थे रिश्ते सभी, बंदूकें तन गयी,
आँख के आंसू सूखे, जमी नप गयी.
ये तुम्हारा हमारा, हमीं हैं नहीं,अब तो लम्हों ने जो फैसला कर दिया,
सदियों को भी रिवाजों से सहना पडा,
कुछ चले भी अगर, रोक कर फिर वहीं,
उनके पैरों को तालों से सीना पडा ,
दुश्मनी दुश्मनी क्या कोई जात है?
ये दिन है यहाँ वो कहें रात है,
इतनी खाई बड़ी , जो पटेगी नहीं,
कितनी मिट्टी पडी पर अड़ेगी वहीं,
दूर से बस हवा को सलामी ही दो,
वो जो अपना कभी ,अब पयामी तो दो,
वो भी खुश है वहां , हम भी कोशिश करें,
दुश्मनी को ख़तम , दोस्ती नाम दें.
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