Wednesday, 30 November 2011

मन की देहलीज .....कहीं कच्ची सी कहीं पक्की सी,,,

 by Suman Mishra on Wednesday, 30 November 2011 at 14:06


मन की देहरी कहीं कच्ची सी कहीं पक्की सी,
कभी कभी दरवाजे की दस्तक नहीं सुनती,
थकी हुयी सी ढेह जाती है बारिशों मैं कभी,
कभी जज्बातों से मिलकर यूँ ही बहक जाती है,,,


इस देहलीज़ पर फूल की जरूरत नहीं,
पत्थरों के ढेर से भी कोई फर्क नहीं
देव-स्थान के द्वार की देहलीज से कम नहीं,
भावों के समन्दर के बाँध बांधे गए हैं इसपर.



रिश्तों की चहारदीवारी से घिरी हुयी है 
जीवन मैं कुछ को अभिलाषित है ये,
देहलीज ये जो मन की, स्थिर सी एक विधा है,
सपनो के पंख बनकर इससे ही हैं निकलते,


इसके तरकश मैं तीर बहुत से हैं
कुछ विष बुझे , कुछ फूलों के रस बुझे,
वक्त की तहजीब से सुशुप्त हैं ये,
बस कच्ची पक्की देहरी स्वतंत्र नहीं.
            *****

वक्त को कहने दो अपनी बातें, हम ने कहा था बोले वो,,,

 

by Suman Mishra on Wednesday, 30 November 2011 at 00:29

हमने जो तामील किया था, वही वक्त तो बोलेगा,
कहने दो जो वो कहता है, ये खुद से खुद को तोलेगा
कभी गर्द उडती राहों पर, कदमो से जो बने निशाँ,
कभी वक्त की आंधी लेकर उड़ जाती छोटा सा जहां

अभी वक्त है हुक्म है उसका ,हम अपनी कुछ बात कहें
कहना क्या ,करना है सबको, दुश्मन को हम मात करें,
हो सकता है मित्र बना वो, साथ मैं अपने चलता हो,
वक्त का ऐनक ज़रा लगा लो चेहरा साफ़ तो दिखता है,

शक्ल सही  पर मन काला हो, वो शत्रु का प्यादा हो,
इंसानों की भीड़ में छुपता, खुद से एक तकादा हो,
ये जीवन के मूल्य को कुछ नोटों में तोल के चलते हैं,
वक्त की आँखें इनपर भी हैं ये सब भूल के छलते हैं.

क्या छोटे बच्चों की चीखें , अखबारों से आती हैं,?
नेता के दो संवेदित शब्दों से चीख रुक जाती है,?
क्या जीवन इतना सस्ता है, माँ के ह्रदय से पूछो तुम,
अब खुद ही आगे बढ़कर इस बुरे वक्त को रोको तुम.
                      *****

Tuesday, 29 November 2011

एक बार मन अलग थलग सा होकर उसका ही बस हो ले

एक बार मन अलग थलग सा होकर उसका ही बस हो ले 

Your changes have been saved.


ये कोई उपहास नहीं है, अंतरमन  की प्यास नहीं है,
जीवन एक मरुस्थल जैसा, उससे मुझको दूर है जाना
कुछ पथरीले पथ हैं आगे, कुछ मन की ये उठा पटक है,
समतल कोना ह्रदय का ढूढूं, अंतरद्वंद से पार पाना है.

एक ह्रदय और लाखों आहें , कैसे मन की थाह मिलेगी,
कब खुश और ग़मों के बादल , सच्चे  मन की चाह मिलेगी,
पलक पलक आँखों के झरने , झरते हैं दुःख की आहट से,
अभी निराशा दूर है मुझसे, आशा को इस पार लाना है.

क्या ये शब्द है मन की झांकी, शायद कुछ तो सच ही होगा,
मन की बात या लौ बत्ती की, एक साथ जल भस्म मिलेगा,
माथे पर जो लिखा भस्म से, कुछ लौ का अपवाद दिखेगा,
आज अलग कल विलग कहेगा, मिलन धरा का छितिज से होगा,


मन का दर्पण बिन पारे का, सब कुछ आर पार है दिखता,
एक नहीं तो दूजे पल का अंत और आरम्भ ये करता,
अब जो भी हो कुछ पल अपने नाम करू मैं सोच लिया है,
एक बार सब दरकिनार हो, उसको अपना  नाम दिया है.
                      *****

Monday, 28 November 2011

दूसरों के हाथो से ख़त क्यों मेरा मुझ तक पहुंचे ?

दूसरों के हाथो से ख़त क्यों मेरा मुझ तक पहुंचे ? 

by Suman Mishra on Monday, 28 November 2011 at 16:19
Your changes have been saved.

दूसरों के हाथों से ख़त क्यों मेरा मुझ तक पहुंचे
पहरेदारी मैं लगे हैं पेड़ के हर पात इस पर,
खुशबू फूलों की है इसमें , कोपलों सी नर्म चाहत,
उनका हर पैगाम हवा खुद ही उड़ा के लाये मुझतक,


रोशनी अंजाम देती शब्द दिखते मोतियों से,
एक पुरवाई ही काफी,चलती है ख़त पहुँचने के,
मेरी यादों में जो बीते पल ,वो पल सब लिखे थे,
क्यों  दिया उस दूसरे  के हाथ जो मुझे प्रिय थे ,

एक रुसवाई है  ये मेरे तरन्नुम और के हों,
ये तो गुस्ताखी हुयी उसकी अगर मैं पूछ लूं तो ?
एक जीवन जिसमें उसका ही बसर है,
दूरिया भरता हुआ, उसका ये ख़त मुझको नज़र है.


सुर्ख स्याही ये नहीं ये फूल के रंग से सजे थे,
हवा के मानिंद से ये रास्ते पहचान लेंगे,
उनका होकर भी ये सदमा फिर है मुझको अजीज
पढ़ना चाहूँ शब्द को पर दृश्य बन जाए शदीद

उनके ख़त को लगा सीने , धड़कने और नयन संगम
एक की आवाज प्रतिपल, एक गति से सजल प्रतिपल,
इन हवाओं की नमी से भीगता सा ख़त अगर तो,
                           ****

Sunday, 27 November 2011

उसकी यादों को बुलाना ही नहीं,


उसकी यादों को बुलाना ही नहीं,

by Suman Mishra on Sunday, 27 November 2011 at 21:24


देखना है शाम होती जिंदगी, हर सुबह पैगाम होती जिंदगी,
क्या करेंगे याद उसकी रख के यूँ,सोची समझी साजिशों सी जिंदगी,
हमने क्या सोचा हुआ कुछ और ही, उसकी सूरत याद हर पल जिन्दगी,
हमने पी आंसू गुजारी इस तरह, उसने हंस कर टाल दी यूँ जिंदगी.

क्या  करे बातें किसी की खाम-खां,इक नशे की है खुमारी जिंदगी,

बेचकर बाजार वापस आ गए, खाली हाथों से लुटी ये जिन्दगी .
सारा घर खुशियों की रहमत माँगता, वो पडा बीमार सा ये जिन्दगी.
फूल एक खिलता है मन में यूँ ही क्यों, बादलों से सींचती है जिंदगी.


एक पल की याद बस दस्तूर है, अच्छरों से जुड़ना जारी है यहाँ ,
क्या लिखा क्या सोचा था इस पंक्ति मैं ,बन गयी कविता सी है ये जिन्दगी
याद उसकी सालों तक आती रही, अब मिली निजात जैसे जिन्दगी,
चाँद तारे रोज आते हैं यहाँ, उसकी यादों को न बुलाना "ही" जिन्दगी .



ख़ामोशी भीतर की , बाहर का आलम शोर भरा. 

by Suman Mishra on Saturday, 26 November 2011 at 14:10

ये नदिया भी शांत अभी है, लहरों की हलचल है कहाँ,
ठांव रुकी नौका सुस्ताती, जीवन पल भर रुका हुआ,
शोर बहुत था बाहर ज्यों क्रंदन की गति गतिमान हुयी,
मन बहता इन धाराओं मैं , संग उसके जीवन संध्या  

खामोशी भीतर की जब जब जड़ फैलाती दिखी ज़रा,
शोर हुआ है कही कहीं पर, तिजारती बाजारों मैं,
चल उठ मन चल ठौर कही ले, इस जग का दस्तूर येही,
कोई छूटा जग बंधन से, मन करता उससे बैर अभी.



ख़ामोशी भीतर थी बाहर सारा आलम बोले है
कौन  गया मेरे मन से, मन ही मन से तोले है,
दिल का शीशा टूट गया, पर किरचों से ना जख्म हुआ,
सब दिल के अन्दर का रिश्ता,क्यों सब मन को कुरेदे है

हर गूंगे एहसास की बोली दिल बेचारा बोले था,
उसने ना समझा था इसको, कोई नहीं किसीका है,
कुछ दिन की एहसान पे दुनिया ,हर पल जीना मुश्किल है
एहसासों को शब्द बना दो, महक बने ये जी ले तो.

Friday, 25 November 2011

मुमकिन जहां गुजारना लम्हा भी नहीं था

मुमकिन जहां गुजारना लम्हा भी नहीं था (श्री रविन्द्र जी द्वारा प्रेरित)

by Suman Mishra on Friday, 25 November 2011 at 12:30


हम उस जगह भी उम्र को आये गुजार के ,
मुमकिन जहां गुजारना लम्हा भी नहीं था,
बातों का रोग यूँ भी जमाने ने पाल कर ,
बख्शा मुझे कुछ शब्द से कुछ तीर की तरह

उसने जो एक बार यूँ अपना कहा मुझे
इस जिन्दगी से माँगा कुछ पल उधार यूँ,
अब शाम का अन्धेरा हर रात चांदनी ,
पानी मैं अक्स उसका, पतझड़ बहार सी, 

बस याद ने उसकी यहाँ सूरत तलाश ली,

उसने तमाम उम्र नकाब मैं ही काट ली,
कुछ शऊर होगा उनकी ह्या या कोई तहजीब
एक वफ़ा का जज्बा ही मेरे काम आ गया,

ये याद की बरसी हमेशा याद रहती है,
हरदम ख्याले रोशनी में तेल के माफिक,
हम जाने कितने पत्थरों मैं ढूढ़ते रहे
क्या मिल गया हवा से एक सलाम ही देके.


हमने बहुत सजदे किये उसकी तलाश मैं,
बस एक ही खुशबू ने मेरी सलामी ली,
अपनी बनाई सूरतों में हम फना हुए,
एहसास उनका मुझपे काबिज जहा रहा,

उड़ते हुए कुछ फूल के टुकडे मुझे मिले,
ख़्वाबों की दरगाहों पे हमने जो चढ़ाए .
मेरा वजूद जाने कहाँ गुम है हो रहा,
चेहरा तो उनके पास अपना भी नहीं था