Tuesday, 22 May 2012

बारिश की बूँद या ---सूखी मिटटी, गीली मिटटी या मरीचिका (हाइकु)


बारिश की बूँद या ---सूखी मिटटी, गीली मिटटी या मरीचिका (हाइकु)

by Suman Mishra on Saturday, 12 May 2012 at 17:27 ·


जल  तलाश
तलाव कही पर हो
जीवन वहीं

हर तरफ
उम्मीद है उसकी
बस पानी हो 


सूखे होंठ हैं
तरबतर सा मन
पसीना बहा

पथिक मन
दूरियों तय कर
मरीचिका थी



बूंदों का नृत्य
देखा था  मैंने कभी
बचपन में

गीले पाँव थे
माँ की डांट पडी थी
भीगा था मन

बार बार मैं
बारिश में निकलूँ
दोस्तों के साथ

अमराई में
कोयल के साथ यूँ
कुहू कुहू से

सूखी  धरती
बारिश अब आ ना
प्यास बुझाना


बारिश, ओस
बूंदों में ठहरी है
कोमल स्पर्श

मेहमां सी है
बरखा रानी यूँ तो
तरसाती है

वो याद आया
बहुत याद आया
ऐसे रुलाया

बूँद या आंसू
दोनों ही मोती से है
बिखरेंगे ही,,,

भूख की बात .......बेटे की जुबानी


भूख की बात .......बेटे की जुबानी

by Suman Mishra on Saturday, 12 May 2012 at 00:57 ·



एक बार मेरे ऑफिस में renovation  work के   तेहत एक मजदूर ने कुछ इस भाव
में कहा की उसे हर वक्त अपने घर की बात याद आती है लेकिन "अब जियरा पोढ़ करेके पडी "
ये पंक्तियाँ आज जब याद आयी तो इस अनुभूति का जनम हुआ,,,


तवे की रोटी
माँ के हाथ से खाई
तृप्त हो गया

सोंधी महक
कहाँ से  आयी होगी
बारिश से ही


ये जमी और माँ का हाथ
दोनों में सोंधा पन है
इन शहरों में माँ की कमी है
भीड़ में अब खाली पन है

गया बहुत मैं दूर माँ तुमसे
थाली सजाई थी मैंने
बिलकुल वैसे ही जैसे तुम
मुझे खिलाती आँगन में

पूछ ना लेना क्या खाया था
क्या रखा था थाली में
कांटे चम्मच सब मौजूदा
तुमने भेजे जो हाल ही में 

येही होता है जब इंसान कुछ करने की तमन्ना में अपने घर से दूर
कदम बढाता है तब उसके जेहन में बस अपने घर की दीवारें
और माँ पिता की बातें ही होती है , पल पल का उनसे संपर्क
मगर सबको अनदेखा कर वो आगे बढ़ता जाता है, अकेले बढ़ने
वाला इंसान जद्दो जहद की सीमाओं में घूमता पेट तो भरता ही है
लेकिन जिस भूख के लिए पेट भरता है उसमे खुद के हाथ और खुद
से बातें करता है ,,और उन सब बातों में दूरी का एहसास बरकरार
रहता है, अपनी बातों को छुपाना और अपने घर की बातें जानना
उसकी आदत में शुमार होने लगता है,,,,,,



भूख आग है , भूख प्यास है
भूख त्रस्त कर देती है
मैं माँ से हूँ दूर बहुत अब
वो  भी तो सब सहती है

कैसे सहता उसकी पीड़ा
कब तक पेट भरेगी  वो
अब तक था जीता आया में
कब तक आँचल सिलेगी वो

जल जाऊंगा मरू में तप कर
नहीं डरूंगा कर्म से मैं
वो देगा जब देगा क्यों अब
भाग्य को आगे रखूँ मैं



लोग कहते हैं यहाँ बेटियाँ परायी हैं
आज मैंने भी तो दर दर की ठोकर खाई है
उनका एक घर से दूसरे घर में कदम रखना
मगर बेटे  के लिए माँ की बस दुहाई है

आज इन ठीकरों से पाँव डगमगाता नहीं
गिरा हूँ कई बार सहारा अब भाता नहीं
अभी तो देखना शुरू किया है दुनिया को
जख्म कितने भी हों अब मैं उन्हें बहलाता नहीं 
                 ****

इतना भी मत सोचो की पाषाण बन जाओ


इतना भी मत सोचो की पाषाण बन जाओ

by Suman Mishra on Thursday, 10 May 2012 at 01:40 ·


इतना भी मत सोचो की पाषाण बन जाओ
कल की यादों में आज नाकाम कर जाओ
जो बीता हुआ कल उसे क्यों याद करते हो
दुनिया अलग हुयी , आज बर्बाद करते हो

ये पल जो साथ साथ है आगे चलो इसके
कुछ सोच आसमा और तारों की भी रखो
हम आज इस धरती पे विसाते विछा बैठे
कुछ चाल चलो ऐसी की शह मात ना पाए



फैला है गर अन्धेरा ,उजाले की बात कर
चिड़ियों के कलरवों में रागों की बात कर

किस पंछी ने किस तान से छेड़ी विभावरी

कुछ सुर नए लगे स्वरों को आत्मसात कर


सूरज हुआ मद्धिम और छाने को चांदनी
फिर नंगे पाँव बाग़ में जाने की बात कर
कुछ ऐसा कर की लगे कल की बात आज हो
तारों के अक्स शबनमी बूंदों की बात कर


कुछ यकीन गर नहीं तो मकसद पे सोच क्या
कर के गुजर तू आगे , निशाने पे हक़ जमा
अपनी तो सोच बाद में  अंजाम है पहले
पाषाण नहीं बनना है हम गतिमान हो पहले

दीवानगी का दौर अब तो बीत चला है
उसकी नज़र का ठौर मन को रीत चला है
फिर वो निगाहें करमो की बाबत ये जिदगी ?
बन चुका जो अतीत दौर बीत चला है

"हाइकू" ." माँ " (प्रयास)


"हाइकू" ." माँ " (प्रयास)

by Suman Mishra on Thursday, 10 May 2012 at 01:02 ·
 
 एक आवाज
गूंजती है मन में
आ जाओ घर

माँ एहसास
मन ज़रा उदास
वो आसपास

एक माँ ही है
आंसुओं में अक्स था
दिल ने देखा


एक सहारा
उसके बाद ही वो
इश्वर आया


पूजा नहीं की
माँ का हाथ ही सही
प्रसाद मिला

भूख ये  दूरी
अपनी मजबूरी
माँ  बुला लो


मेरा घर वो
माँ रहती है वहा
मैं दूर हुआ

वो हाथ नर्म
स्पर्श में संयम ही
माँ का आभास


कब अलग
मेरी तस्वीर माँ से
मैं माँ जैसा  हूँ

उसके होने का एहसास कुछ खुशबुओं के साथ सा है


उसके होने का एहसास कुछ खुशबुओं के साथ सा है

by Suman Mishra on Wednesday, 9 May 2012 at 01:17 ·

उसके होने का एहसास कुछ खुशबुओं का साथ सा है 
बीच में मौसमों की मार गुजर जाती है
कभी पतझड़  , कभी बारिश के तेज छींटों से
एक झोंके की तरह  सब्ज मन कर जाती है 

आजकल रोशनी में गर्म सा एहसास बहुत
चाँद भी जल रहा है बादलों की ओट लिए
एक एहसास ही तो है जिसे अपने  मर्मो से
बदल के पहलुओं को जज्ब उसे करते हैं 


चलो अच्छा ही हुआ सब छुपा एहसासों में
बात निकलेगी तो ये दूर तलक जायेगी
जमी पे  क़दमों के निशाँ जो हैं जाने कितने 
आसमा से भी कभी हाथ मिला आयेगी

कब तलक आसमा की तरफ यूँ ही देखूं
क्यों ना फूलों के रंग उसको भी मैं पेश करू
कही तारों में गर खुशबू की एक सबा होती
चांदनी भी उसी में रोज नहा कर आती .

हमने महसूस कर लिया है उसे मेरी खता
नहीं बख्शेगा मुझे जानकर वो मेरा पता
मगर एहसास को बांधा है मैंने धड़कन से
ली अगर सांस तो बस सारी जुबानी है अता


बहुत मुश्किल से नजाकत से है रखा इसको
कभी तन्हाई में एहसास मेरे रु-बरू से
ये नुमाया भी कभी हुए अगर देखेंगे
मेरे एहसास और उसमे ताजगी कितनी.

आज और कल में फर्क क्या है...


आज और कल में फर्क क्या है...

by Suman Mishra on Sunday, 6 May 2012 at 02:07 ·
 

आज और कल में फर्क क्या है
कहो तो ज़रा आज हम भी सुने
सूना था ये पहले थी सोने की चिड़िया
थोडे से पंख स्वप्न हम भी बुने

बहुत बदला सा है ये जीवन हमारा
कहाँ वो पुरानी कहानी का राजा
कहाँ आज बैठा है सड़कों पे इंसा
गिने चंद सिक्के , फटा उसका जामा



वो पहले की बातें , थे लगते जो  मेले
बहुत सारी चीजें  भरे होते झोले
अभी तो नुमाइश नहीं और कुछ है
ना जाने उतरती हैं सेलों में तस्वीरे

वो अनजानी सी एक खुशी थी अजब सी
वो फूटा गुब्बारा , और आंसू पलक पे
बहुत प्यार था अपनी छोटी सी दुनिया
मगर आज ये क्या पहचाने सजग सी


अभी ना वो बचपन ना दादा ना नानी
नहीं कोई कहता पुरानी कहानी
सभी मगन है, नयी फिल्मो की बातें
मगर क्या नहीं है अब तनहा सी राते ?

खडा भीड़ में पर है खुद में अकेला
चला जा रहा खुद को ठगता अकेला
ये अनजान राहों पे इंसा खडा है
समझने में मसरूफ , जिंदगी का झमेला

हर बात अधूरी ही सही रहने दो,,,,


हर बात अधूरी ही सही रहने दो,,,,

by Suman Mishra on Friday, 4 May 2012 at 01:23 ·

अपनी हर बात अधूरी सी यूँ ही रहने दो
बिना लहरों पे तिरी नाव यूँ ही रहने दो
जाने क्यों ये अलग एहसास मुझे भाता है
अपनी बातों मेरी बात ख़ास रहने दो

कहीं भी नाम मेरा आये अभी सोच लो तुम
नहीं देना उसे अंजाम अभी सोच लो तुम
ये तो मंजिल नहीं या कोई भी चौ रास्ता सा
मुड़ेगा जाके मेरे पास अभी सोच लो तुम



तुम्हारी शक्ल पे अब अक्स मेरा आता है
कभी गुमराह सा मुझको भी कर के जाता है
ये बेगुनाही ही हुयी मैंने खुद अलग करके
जो तुम्हारा था तुम्हे सौंप दिया ,कह के चला जाता है

अधूरी बात ने मुझको अजब  एहसास दिया
एक हल्की सी कहर , मगर उसने आस दिया
तुम्ही बोलो ये बात कैसे दूं विराम इसे
जिसने मुझे अब जीने का एहतराम दिया


बस एक फूल का खिलना अभी भी जारी है
थोड़े से शोख रंग , भरने की तैयारी है
इसे पूरा ना करू, और भी रंगों की तहद
अधूरा ही सही , खुशबू में खुमारी है

ना जाने कितने अधूरे मन यहाँ पूरे ना हुए
येही विधा है जो सपने यहाँ  अधूरे रहे
फिर उन्हें बार बार मन के द्वार पर रखा
एक अधूरी सी बात पूरा है अधिकार मुझे,