Sunday, 30 September 2012

परी कथाओं सी यादें , शूलों सी बन जाती हैं

परी कथाओं सी यादें , शूलों सी बन जाती हैं

by Suman Mishra on Sunday, 2 September 2012 at 12:04 ·

 

परी कथाओं सी यादें ,
क्यों शूलों सी बन जाती हैं ,
कुछ हलके फुल्के छन जैसे
संधानित सी हो जाती हैं

बस एक याद और शूल समीर
यूँ रोम रोम में बस जाए
हर सांस का आना दुर्लभ हो
जाने पर भी पाबंदी हो .

 हर दिवस सूर्य का कुछ पल ही
रक्तिम स्पर्श दिखाती है
कुछ छन को जो गर भूलो तुम
फिर दिवस ज्वलित कर जाती है


कोई सौन्दर्य नहीं सुंदर
इसके पीछे ये काया है
वस्त्रों से आच्छादित कर देखो

या फिर बिन पोषण ये माया

कैसा होगा उसका हर दिन
जो समझ गया था उस पल को
कर विदा सभी को जाना था
शब्दों से  हर मंथन  उसका !!

स्पन्दन शब्दों में ढला हुआ

मैं उसको गढ़ कर देखूं  जो 
आकृति बनती बिगडती है
यादों के शूल से विन्धा  हुआ,,,

मुझे फूलों से मत तोलो,मगर पत्थर भी मत मारो (असमय अंत का दर्द )

मुझे फूलों से मत तोलो,मगर पत्थर भी मत मारो (असमय अंत का दर्द )

by Suman Mishra on Friday, 31 August 2012 at 00:41 ·


मैं एक जरिया हूँ शब्दों का
मुझे वो बात कहने दो
सत्य हैजो मगर कटु है
आइना साफ़ दिखने दो

मैं वो आवाज हूँ जिसको
हवा ने भी रोका रास्ता
कोई ध्वनि ही नहीं आयी
मेरी कोशिश है बाबस्ता



महकता था मैं गुलशन में
लाल सयाही ना बनना था
खिलने की बात सुनते ही
मुझे बरबस ही तोड़ा था

मगर अब मेरे आंसू से
लिखे जो शब्द मेरे हैं
रहा घुट घुट के जीवन भर
ख़तम पन्नो का रोड़ा है

ख़तम होकर हूँ मैं जन्मा
शब्द को कितना मारोगे
ये वो शय है की जीतोगे
मगर हिम्मत से हारोगे

शब्द में शब्द जुड़कर मैं
नयी आकृति तराशूंगा
मुझे ना देख पाओगे
मैं सबको खुद में लाऊँगा,

मेरी अंतिम इबादत ये ,
कोई भी अलग मत करना
मुझे मत फूल से आंको
मगर पत्थर भी मत कहना ,,,,,

मन का शिलालेख

मन का शिलालेख

by Suman Mishra on Thursday, 30 August 2012 at 18:10 ·



होंगे प्रस्तर के शिलालेख ,
पर मन का लेख कहाँ लिक्खा
सदीयों से बाँट रहा मानव ,
खुद की बातें बस शब्दों में

कितने पन्नो पर लिखा गया
जीवन का हर पल अंकित सा
कुछ बात रही मन की मन में
कुछ शब्द हवा में बिखर गया..

कुछ बने वेदना स्वर मंडित
कुछ सुर लहरी की तान बने
कुछ रास रंग की गाथा से
ऊंचे लोगों की शान बने

गाथा उसकी जो अमर हुआ
इतिहास वही जो बीत गया
पर सांस की बातें करनी है
हो शिलालेख लेख बस जीवन का


जीवन के बाद पहचान कहाँ
वो पकड़ नहीं सकता सांसें
स्वर के आलाप तो ऊचे थे
पर तार नहीं थे  साजों में

अब तहरीरों की गाथा में
हमने बांधा है संयम को
कुछ नया नहीं बस पल ढलते
बन जाते हैं वो शिलालेख

वेदना के पुष्प हैं ये,,,,सूख कर कांटे बनेगे,,,(आदरनीय श्री रविन्द्र सर की याद में )

वेदना के पुष्प हैं ये,,,,सूख कर कांटे बनेगे,,,(आदरनीय श्री रविन्द्र सर की याद में )

by Suman Mishra on Sunday, 26 August 2012 at 13:57 ·



वेदना के पुष्प हैं ये , सूख कर कांटे बनेगे
पंखुरी का रंग छूटा, नेह मन से रहा रीता
अब कहां खुशबू बसेगी, टूटते दल सा दिखेगी
नीद की चिर अवधि सा ही, ये भी मुर्झा के गिरेंगे


सारे  रिश्ते रेत से थे, निकले हाथों से फिसल के
डूबना है सोचकर ही साथ छोडा तिनके ने भी
डोर उसकी दिशा अपनी, खेल सारे उसके न्यारे
पाले में हम कहाँ ठहरे , हर विधा का वो खिलाड़ी

हर दिशा बादल से ढक दो , ग्रहों को भी मात दे दो
खेल खेले शर्त अपनी , जीत अपनी वो ही हारे
क्यों बनायी देह उसने , पांच तत्व और कुछ अंगारे
ये क्रिया अब सीखनी है गए को वापस बुला ले (हम)

मैं ने बोला मैं ना जाऊं, क्यों धरा नश्वर बनाऊं
उसकी बातें थी तिलस्मी, आज ये क्यों गीत गाऊँ
था व्यथित जीवन को लेके, मर्म मैं ना समझ पाऊँ
अब मिले हैं पंख मुझको, मत बुलाओ मैं ना आऊँ

मैं लड़ा था जाने कितना , तब मिला किश्तों में जीवन
सांस कम थी , विरहिणी सी जोहती थी बाट उसकी
शब्द में बस ह्रास ही था, अंत का एहसास भी  था
क्या करेंगे पुष्प खिलकर, काँटों का संताप जो था


इस कथा का अंत कर दो , कंटकों को भी कुचल दो
माना की ये दर्द देंगे , फिर भी थोड़ा भ्रम ही भर दो
धरा है गर अचल रहती , मैं छितिज सा फिर जुड़ूगा
वेदना के पुष्प सूखे , कंटकों में मैं खिलूँगा,..

दरकते चेहरों को जोड़ने की कोशिश

दरकते चेहरों को जोड़ने की कोशिश

by Suman Mishra on Wednesday, 22 August 2012 at 00:39 ·



खेले होगे साथ साथ मगर
बातें भी होंगी जाने कितनी मगर
हालातों के नयन नक्श बदले अगर
दरक गए चेहरे जाने कितने हिस्सों में

बड़ी खूबसूरत बयानी की थी पहली बार
जाने कितने फूलों को समेटा था लब्जों में
मगर मौसम ने रुख बदला तो ये क्या
तवारुफ़ भी नहीं सामने से गुजर गए

कभी शब्दों के तीर चल गए अनजाने में गर
मैंने टांक दिया जो पैबंद बन गए
कितनी भी दूरियों का रस्ता बना दिल में
हम ने वही छोटे रस्ते का था रुख किया


तनहा तो ये जहां कहे वो कहे जो  कहे
हमने तो जख्म पे कई मलहम लगा लिए
कितनी भी सरगोशियों जो तीर सी लगी
एक हंसी की वो ढाल ने परदे गिरा दिए..


एक मर्ज है इंसान यूँ ही खुद को बांचता
आवाज मगर घुट के अन्दर ही जमी है
कितनी ही चीख गूँज कर देती है दुहाई
या खुद की  ही तस्वीर वो  रस्तों पे पडी हो

क्या मिल गया वो अक्स ?जो उसने था बनाया
या  धुल बवंडर से मिली खेल कर गयी
लहरों की वजह  मिट गए सारे ही निशाँ यूँ
बस दिल से बनाया था साहिल पे बैठके

ये आखिरी निशाँ बचा जो खून का ही था
अब बोलो की कहेगा वो अपनी दास्ताँ
कितने उबाल आये थे जब जिस्म में बहा
अब रह गया दागों की तरह मौन छाप सा

कहते हैं लोग क्या कहा है मैंने यहाँ पर
अखबार पढ़ के देख लो हर दिशा की खबर
ये भी उसी के रंग में रंगी तहरीर सी
एक तरफ टुकड़े जिस्म के एक तरफ है परी

गीत बरस जायेंगे उस दिन . जिस दिन अम्बर मेघ से खाली ..(कुछ अलग अलग रंग )

गीत बरस जायेंगे उस दिन . जिस दिन अम्बर मेघ से खाली ..(कुछ अलग अलग रंग )

by Suman Mishra on Sunday, 19 August 2012 at 23:31 ·



कहते हैं शब्दों में क्या दम,
बस बतकही को बाँध लो इसमें
विषयों में अनुराग दिखा तो ,
प्रेम से नफरत कहाँ हुयी कम

सूख सूख कर परती धरती
मगर नयन में जल फिर कैसा
शब्दों से मल्हार जुड़ा तो
बिन मेघो के पानी बरसा


दृश्य अचंभित कर देता है
मन को दम्भित कर देता है
ये क्या ये तो कुछ भी नहीं था 
मैं गर हूँ   मन "स्वर देता है"

ज़रा निकल बाहर की धुप में
सीमा के प्रहरी सा बन तू
रग रग में हो रक्त की जुम्बिश
दुश्मन रण में नहीं दिखेगा

मोर पंख जब फैले वन में
मन मयूर सा नृत्य हो मन में
एक एक पत्ते की सर सर
शब्द समीर यूँ बहे कलम से

कहाँ आम के बौर लगे हैं
कहाँ पे कोयल कूक रही है
मैं पकडूं शब्दों में इनको
नहीं तूलिका अब भाती है

तुम पुकार लो......

तुम पुकार लो......

by Suman Mishra on Friday, 17 August 2012 at 01:04 ·


(विरहिन काया)
वो निश्छल सी , वो निश्चल सी
काया बन जीवन में आयी
हरसिंगार के फूलों सी
मन की क्यारी महक उगाई

मन का बावरा परदेशी वो
चला गया सब छोड़ कमाने
वो दीपक के बाती सी थी
जल जल तम में रही सिरहाने

कभी कभी मन पंख लगा कर
मिल के आयी प्रीती दीवानी
कभी वो राधा कभी मीरा सी
श्याम कहाँ तुम,जग विसराने

(कभी किसी ने प्रेम किया था)

फूल की खुशबू ,हल्की हल्की 
पर यादों की टहनी हरी है
माना ये टूटा था उससे
मन पर इसकी छाप वही है

जाने कबसे मौन की  स्मृति
छुपी हुयी है इन पन्नो में
हल्का सा स्पर्श नजरों से
बिखर ना जाए एक झोंके में

दरवाजों से बंद ये पन्ने
बने धरोहर उन यादों के
दिल की दस्तक से खोले थे
वो कपाट जो बंद यादों में


(पुकारों का परावर्तन)
आज दौर है दूर देश का
धरती से ग्रह की बातों का
मगर पुकारों की भाषा में
प्रेम प्रेम और प्रेम दीप्ति सा

यादों को पुकार कर देखो
खुद को वही कहीं पाओगे
जहां से पग थे मुडे यहाँ तक
एक ही पल में आ जाओगे

बस कुछ करुना और अश्रु हो
स्वर में आर्त , तड़प की ध्वनि हो
इश्वर की अंजलि के पुष्प सा
विरह , प्रेम मय, शब्द अर्पण हो

एक वेदना जो तडपाती
निकट भी होकर दूर ही जाती
इस पुकार के आवर्तन से
पास में उसके ले ही आती,,,,