Saturday, 13 August 2011

" नगर वधु "

 छनक छनक ज्यों झालर झांझर,
रुन-झुन रुन-झुन ध्वनि झंकृत है,
मन वीड़ा के तार बजावत ,
आवत है हिय जारि जरावत ,
...
टिप टिप टप टप बूँद पडत है,
ताल बजावत ज्यों मृदंग के,
आत्मित ब्यथित तरुण सी करुणित,
दिग दिगंत अब तनिक रिझावत,

आँख अश्रु अब बहत ना निर्झर,
ज्यों ज्यों दिवस है बीत बितावत ,
मनन है चितन मुख मुद्रा क्यों,
नाम और कुछ नाम बतावत,

चलत चलत,मद गज गामिनी सी,
नारी ह्रदय मन है कुम्ह्लावत,
आवत है राजा और परजा,
सब कै संपदा बधू कहावत.

जगत सौप कै काह काज है,
काहे जनम ई धिया ई पावत,
जगत बन्यो जब नारी जननी भई
दुःख ,भय ,नारी हिय सबै सतावत.

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